“I’m V K Shekhar, IPS (Retd.) at Government of India. I live in Ghaziabad, India. But basically, I belong to Farukkhabad. I am proud of being a human being. My favorite lines are “Even sky should not be the limit to your achievements.”

Practically only the human being can decide and set direction and pace of his action and work and influence the action and work of other living beings and action and work happening in the non-living things in his surroundings.
He can utilize potential of himself as well as that of the surrounding universe comprising living or non living beings including of course the other human beings, to produce some desired results.

ग़ज़ल
निर्वाह कर सके न कभी तीरगी से हम,
कहते हैं शेर रोशनी के, हर किसी से हम।
बच्चों की मुस्कुराहटों पे जां निसार दें,
बढ़कर उसे तो मान रहे हर ख़ुशी से हम।
माने वो सिरफिरा कि गुनहगार, अब मुझे,
जायज़ सवाल करते रहे हर किसी से हम।
दुश्मन की क्या बिसात, कि वो वार कर सके,
डरते हैं कुछ इक दोस्तों की दोस्ती से हम।
इंसान ही बनाता रहा है धरा पे स्वर्ग,
ये काम कर रहें हैं, मगर सादगी से हम।
ज़िन्दा हो तो, ज़िन्दादिली, कुछ तो दिखाई दे,
लड़ते रहेंगे होश में अफ़सुर्दगी से हम।
जिसमें किसी के दर्द से तक़लीफ़ ख़ुद को हो,
यारो अभी भी दूर हैं उस बंदगी से हम।
लीकों पे चल सके न किसी के दवाब में,
ख़ुश हैं बहुत ही जह्न की आवारगी से हम।
अशआर रोशनी की कोई राह खोल दें,
है फ़र्ज़ ये, निभाते जिसे शायरी से हम।
तीरगी= अँधेरा, निसारना= न्योछावर कर देना, बिसात= सामर्थ्य, अफ़सुर्दगी= उदासीनता। लीक=पूर्व निर्धारित रास्ता, अशआर=शेर का बहुवचन।
-वीरेन्द्र कुमार शेखर
ग़ज़ल
यारो, जीवन क्या होता है?
कुछ का, सपनों-सा होता है।
बस उस पर ही प्यार उमड़ता,
जो लगता, अपना होता है।
सहज भाव जिसने भी छोड़ा,
वो जल्दी बूढ़ा होता है।
कहने में कुछ खर्च न होता,
करने में, करना होता है।
दुनिया कहती मज़हब जिसको
इक सँकरा पिंजरा होता है।
अहंकार-आलस जब हटते,
तब ही दिल हल्का होता है।
आशंकाएं दूर रखीं जब,
काम तभी अच्छा होता है।
जितनी जिससे आस बँधी, वो,
कम उससे थोड़ा होता है।
यार-दोस्त के रहते भी तो,
मन अक्सर तन्हा होता है।
– वीरेन्द्र कुमार शेखर
वीरेन्द्र कुमार शेखर
आबरू शायरी की रखा कीजिए,
दिल से दिल की ग़ज़ल ही कहा कीजिए।
है तमन्ना अगर अब अमन-चैन की,
ख़ुद से ख़ुद तो न अक्सर लड़ा कीजिये।
सब्र करने से ताक़त मिली है सदा,
अश्क़ आँखों से यूँ मत जुदा कीजिये।
उस ने सबको बनाया है सबसे अलग,
साथ धारा के ही मत बहा कीजिये।
अब इसी से मिलेगा सुकूँ, है यकीं,
दर्द हद से बढ़ा, क्या दवा कीजिये।
वक़्त जाया किए फेसबुक पर बहुत,
अस्ल की भी तो इज़्ज़त ज़रा कीजिए।
शोर बाहर का बेशक़ ये, थम जाएगा
दिल की आवाज़ भी कुछ सुना कीजिये।
वीरेन्द्र कुमार शेखर
वक़्त मुझसे दोस्ती ही दोस्ती करता रहा,
और उसके साथ मैं बस दिल्लगी करता रहा |
मानकर उसको मसीहा, पूजते मक़्तूल थे,
जिब्ह करते बात कुछ जो पंथ की करता रहा।
सोचने-करने के वक़्तों में रहा गफ़लत में जो,
वो तो ख़ुद के साथ खुल के दुश्मनी करता रहा।
कोई तो होगा मेरे जैसा, कुछ ऐसा सोच के,
जो मिला, मैं उससे बढ़ के, दोस्ती करता रहा।
ज़िम्मेदारी जिसको भी दी, बंद रख के आँख- कान,
कार्यवाई देख लो वो काग़जी करता रहा।
कर दिखाया जिसने कुछ, सब मुश्किलों के बावज़ूद,
वो अँधेरे रास्तों में रोशनी करता रहा।
मसीहा= मृतक को जिलाने वाला, मक़्तूल=जिसका क़त्ल हुआ हो, जिब्ह करना= गला रेत कर मारना, गफ़लत=असावधानी, बेपरवाही, बेसुधी
वीरेन्द्र कुमार शेखर
क्या मैं इतनी भी न हसरत करता?
वो ज़रा प्यार से रुख़सत करता।
यार इतनी तो शरारत करता,
तर्क करने को मुहब्बत करता।
उससे बस एक शिकायत है मेरी,
कुछ कभी वो भी शिकायत करता।
आना-जाना जो है दस्तूर यहाँ,
दर्द मेरा भी तो हिजरत करता।
हक़ से महरूम जिसे करते हो,
हक़ उसे है कि बग़ावत करता।
हक़ में होता अगर ये इंसां के,
मैं खुले आम बग़ावत करता।
बात ये किस सदी की है ‘शेखर’,
आजकल कौन रफ़ाक़त करता।
हसरत=इच्छा, तर्क करना= छोड़ देना, हिजरत करना=प्रस्थान करना, विदा होना, रफ़ाक़त=दोस्ती, ,
डॉ. वीरेन्द्र कुमार ‘शेखर’
हक़ी़क़तों को बताती,है करबला अब तक
उन्हीं का सोग मनाती, है करबला अब तक
शहादतों को जो ईमान मानते आए
उन्हीं को राह दिखाती, है करबला अब तक
वो जिनमें चाह रही है, के इल्म हासिल हो
उन्हीं को राह बताती,है करबला अब तक
हुआ था सख़्त बहुत आदमी की ख़ातिर जो
वो वक़्त याद दिलाती, है करबला अब तक
वो जिसमें दिल है, जिगर है, ख़ुदा का बंदा है
उसी को दोस्त रुलाती,है करबला अब तक
कुछ इक तो अबभी समझ पाए हक़ न इसपर तो
*लहू के अश्क बहाती है करबला अब तक*
सुनो जो ग़ौर से शेखर तो सुन सकोगे उन्हें
शहादतों को सुनाती, है करबला अब तक।श
माँ शारदे, वरदान दो, हम शिशु तुम्हारे,
अज्ञानता में ज्ञान के दे दो सहारे
मद, मोह, माया, काम, में जीवन फँसा है,
आँखें कहाँ वो देखतीं जो सच हुआ है,
कोई हमारा शत्रु बाहर का न सक्षम,
हैं आंतरिक अपनी कमी से आज अक्षम,
पाएं विजय यदि क्रोध पर जग जीत लेंगे,
सारे जगत को प्रेम का संदेश देंगे,
जग जाएं सोए भाग्य कुछ अब तो हमारे,
माँ शारदे, वरदान दो, हम शिशु तुम्हारे
जीवन अहिंसा, सत्य के पथ पर चले अब
अस्तेय का पालन करें औ सुख मिलें सब
सब कामनाएं हों हमारी लोकहित में
जीवन चले रख अपरिग्रह का ध्यान चित में
हम स्वच्छता का भी करें पालन सही अब
संतोष प्रतिफल में रखें, कर्मठ रहें सब
अब ज़िन्दगी में मिल सकें सच्चे सहारे
माँ शारदे, वरदान दो, हम शिशु तुम्हारे
जीवन तपस से रात-दिन समृद्ध हो अब
नित स्वाध्यायों से निखरते जाएं जन सब
हर काम ईश्वर को समर्पित कर करें हम
यह भाव मन में जागृत हो, दूर हो तम
नित आसनों को भी नियम से हम लगाएं
आयाम सारे प्राण के, जीवन सजाएं
सब जानते हैं हम तुम्हारे हैं दुलारे
माँ शारदे, वरदान दो, हम शिशु तुम्हारे
आचार प्रत्याहार का समुचित करें हम
अब लालसा भी बाह्य चीजों की करें कम
हम धारणा भी ध्यान की रक्खें मनन में
संभव समाधी हो, फलें फूलें जगत में
उद्देश्य जीवन का सफल हो आज सुखकर
आनन्द पाएं सब जगत में साथ मिलकर
माँ की कृपा हो तो सुखद हों सब नज़ारे
माँ शारदे, वरदान दो, हम शिशु तुम्हारे
इश्क में जब हम ख़ुदी को भूलते हैं
बन्दगी में, ज़िन्दगी को भूलते हैं
क्या भयानक बाढ़ ये लाती रही है
शह्र में जब हम नदी को भूलते हैं
ये सिफ़त अपनी रही है दोस्तो कुछ
काम में हम, हर किसी को भूलते हैं
सिफ़त=विशेषता
काम से रखते जो दूरी ज़िन्दगी में
ज़िन्दगी भर वो ख़ुशी को भूलते हैं
आसमानी रहमतों की चाहतों में
हम धरा की रोशनी को भूलते हैं
देखकर इक घोंसला सुन्दर, सुरक्षित
आधुनिक कारीगरी को भूलते हैं
नासमझ कितने हैं वो सोचो तो ‘शेखर’
लम्हे के आगे सदी को भूलते हैं
लम्हा=पल, क्षण
– वीरेन्द्र कुमार शेखर
सोचने ही से मुरादें तो नहीं मिल जाती
ऐसा होता तो हर एक दिल कि तमन्ना खिलती
कोशिशें लाख सही बात नहीं बनती है
ऐसा होता तो हर एक राही को मंज़िल मिलती
मैंने सोचा था के इंसान की क़िस्मत अक्सर
टूट जाती है बिखरती है सँभल जाती है
अप्सरा चाँद की बदली से निकल जाती है
पर मेरे वक़्त की गर्दिश का तो कुछ अंत नहीं
ख़ुश्क धरती भी तो मझधार बनी जाती है
क्या मुक़द्दर से शिकायत, क्या ज़माने से गिला
ख़ुद मेरी साँस ही तलवार बनी जाती है
हाए,
फिर भी सोचता हूँ,
रात की स्याही में तारों के दीये जलते हैं
ख़ून जब रोता है दिल गीत तभी ढलते हैं
जिनको जीना है वो मरने से नहीं डरते हैं
इसलिये,
मेरा प्याला है जो ख़ाली तो ये ख़ाली ही सही
मुझको होँठों से लगाने दो यूँ ही पीने दो
ज़िंदगी मेरी हर एक मोड़ पे नाकाम सही
(फिर भी उम्मीदों को पल भर के लिये जीने दो) (Sung by Rafi )
उँगली दिखा के एक, बताता जो ग़ल्तियाँ,
उसकी तरफ भी तीन हुआ करतीं उँगलियाँ।
गोली विटामिनों की उन्हें दे रहे हैं वो,
जिनको न मिल सकीं हैं कभी ढंग से रोटियाँ।
सीधे बुढ़ाते जा रहे, अब होंगे कब जवां,
बच्चे गए जो भूल ये, बचपन की मस्तियाँ।
पीना पड़ा है ज़ह्र जो जीवन में आजतक,
मेरी जुबान में न हों कैसे ये तल्ख़ियाँ।
दुनिया में सच की राह पे जो भी चला कभी,
उस पे तो लोग कसते ही रहते हैं फब्तियाँ।
– वीरेन्द्र कुमार शेखर
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