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इश्क़, प्रेम… प्यार, कैसे व्यक्त करूँ इस भाव को ?

इश्क़—यह शब्द अपने भीतर एक ऐसा मधुर संगीत समेटे हुए है, जिसकी प्रतिध्वनि मनुष्य के अस्तित्व के सबसे गहरे कक्षों तक सुनाई देती है। यह केवल आकर्षण नहीं, केवल चाहत नहीं, बल्कि आत्मा की वह सूक्ष्म स्पंदन है जो जीवन को साधारणता से उठाकर किसी दिव्य अनुभूति के समीप ले जाती है। जब हृदय पहली बार किसी की उपस्थिति से इस प्रकार स्पंदित होता है, तब इश्क़ एक कोमल अंकुर की भाँति जन्म लेता है। किसी की आँखों की नमी, किसी के स्वर की मिठास, किसी के मौन की गहराई—सब कुछ अचानक अर्थपूर्ण हो उठता है। संसार वही रहता है, पर उसे देखने वाली दृष्टि बदल जाती है।

इश्क़ का प्रारंभ प्रायः शारीरिक आकर्षण से होता है। मनुष्य सौंदर्य की ओर सहज ही आकृष्ट होता है, क्योंकि प्रकृति ने सौंदर्य को सृजन का प्रथम द्वार बनाया है। किंतु यदि प्रेम केवल देह तक सीमित रह जाए, तो वह समय के ताप में शीघ्र ही मुरझा जाता है। सच्चा इश्क़ देह के पार जाकर मन की धरती पर उतरता है। वहाँ वह दो व्यक्तियों के बीच विचारों, संवेदनाओं और अनुभूतियों का सेतु बन जाता है। तब प्रेम केवल मिलन की आकांक्षा नहीं रहता, बल्कि एक-दूसरे के भीतर उतरने की साधना बन जाता है।
भावनात्मक स्तर पर पहुँचकर इश्क़ मनुष्य को भीतर से परिवर्तित करने लगता है। वह कठोरता को पिघलाता है, अहंकार को नम्र बनाता है और स्वार्थ को धीरे-धीरे त्याग में बदल देता है। प्रेम में पड़ा हुआ व्यक्ति केवल अपने लिए नहीं जीता; वह प्रिय के सुख में अपना सुख और उसके दुःख में अपना दुःख अनुभव करने लगता है। यही कारण है कि इश्क़ मनुष्य को अधिक सहृदय, अधिक करुणामय और अधिक मानवीय बना देता है।

किन्तु इश्क़ की यात्रा यहीं समाप्त नहीं होती। जब यह अनुभूति और अधिक गहरी होती है, तब वह आध्यात्मिक आयाम को स्पर्श करती है। तब प्रिय केवल एक व्यक्ति नहीं रह जाता; वह समस्त सृष्टि का प्रतीक बन जाता है। सूफ़ियों ने इसी अवस्था में कहा था कि इश्क़ अंततः ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग है। जब प्रेम अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचता है, तब ‘मैं’ और ‘तुम’ का भेद विलीन होने लगता है। प्रेमी को प्रत्येक चेहरे में उसी प्रिय का प्रतिबिंब दिखाई देता है। वृक्षों की हरियाली, नदी का संगीत, आकाश की नीरवता—सबमें वही एक चेतना स्पंदित प्रतीत होती है।

इश्क़ की अंतिम परिणति सार्वभौमिकता में होती है। वहाँ प्रेम किसी व्यक्ति, धर्म, जाति या सीमा का बंधक नहीं रहता। वह करुणा, सह-अस्तित्व और समग्रता का रूप धारण कर लेता है। तब मनुष्य यह अनुभव करने लगता है कि समस्त जीवन एक ही विराट चेतना की अभिव्यक्ति है। यही इश्क़ का सर्वोच्च रूप है—जहाँ प्रेम अधिकार नहीं, समर्पण बन जाता है; प्राप्ति नहीं, विस्तार बन जाता है। इस प्रकार इश्क़ केवल हृदय की भावना नहीं, बल्कि आत्मा की अनंत यात्रा है—ससीम से असीम की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर, और ‘मैं’ से ‘हम’ की ओर।

इश्क़—यह केवल हृदय की एक क्षणिक तरंग नहीं, बल्कि चेतना की वह गहन यात्रा है जो मनुष्य को उसकी सीमित सत्ता से उठाकर अनंत के स्पर्श तक पहुँचा देती है। यह जीवन के उन दुर्लभ अनुभवों में से एक है, जो व्यक्ति को भीतर से तोड़ता भी है, गढ़ता भी है; रुलाता भी है और अंततः एक ऐसी शांति तक ले जाता है जहाँ शब्द मौन हो जाते हैं। इश्क़ का अर्थ केवल किसी व्यक्ति के प्रति आकर्षण नहीं, बल्कि अस्तित्व के साथ गहरे सामंजस्य का अनुभव है। यह यात्रा अनेक आयामों से होकर गुजरती है—आकर्षण, भावनात्मक जुड़ाव, संघर्ष और परिपक्वता, निःस्वार्थता, भक्ति और अंततः सार्वभौमिकता।

इश्क़ का पहला आयाम आकर्षण है। यह वह सूक्ष्म क्षण होता है जब किसी अनजान उपस्थिति से मन में एक अनिर्वचनीय कंपन उत्पन्न होता है। जैसे शांत झील में अचानक कोई कमल खिल उठे, वैसे ही चेतना में किसी के प्रति एक कोमल हलचल जन्म लेती है। यह आकर्षण कभी किसी के रूप से उत्पन्न होता है, कभी उसकी वाणी से, कभी उसके स्वभाव की गरिमा से, और कभी किसी ऐसी अदृश्य आभा से जिसे शब्दों में बाँध पाना संभव नहीं होता।

आकर्षण का यह अनुभव अत्यंत रहस्यमय होता है। व्यक्ति स्वयं भी नहीं समझ पाता कि वह बार-बार उसी व्यक्ति के बारे में क्यों सोच रहा है। उसका मन अनायास ही उसी की ओर लौटने लगता है। उसकी उपस्थिति सामान्य क्षणों को भी असाधारण बना देती है। संसार पहले जैसा ही रहता है, पर उसे देखने वाली दृष्टि बदल जाती है। यह अवस्था एक नई दुनिया के द्वार खोलती है। व्यक्ति अपने भीतर ऐसी संवेदनाओं को अनुभव करता है जो पहले कभी जागृत नहीं हुई थीं। उसकी कल्पना अधिक रंगीन हो जाती है, उसके भीतर संगीत अधिक मधुर सुनाई देने लगता है, और जीवन अचानक अधिक अर्थपूर्ण प्रतीत होने लगता है।

किन्तु आकर्षण स्थायी नहीं होता। यह केवल बीज है, वृक्ष नहीं। यदि यह केवल बाहरी रूप, देह या क्षणिक भावनाओं पर आधारित है, तो समय के साथ समाप्त हो जाता है। सौंदर्य क्षीण होता है, परिस्थितियाँ बदलती हैं, और क्षणिक मोह धीरे-धीरे टूटने लगता है। पर यदि आकर्षण के भीतर आत्मिक गहराई का तत्व उपस्थित है, तो वही आगे चलकर इश्क़ के अगले आयाम का द्वार बनता है।

जब आकर्षण केवल बाहरी अनुभव न रहकर भीतर उतरने लगता है, तब इश्क़ का दूसरा आयाम आरंभ होता है—भावनात्मक जुड़ाव। यहाँ व्यक्ति केवल किसी के प्रति आकृष्ट नहीं होता, बल्कि उसके साथ जुड़ने लगता है। अब वह केवल उसके रूप को नहीं देखता, बल्कि उसकी संवेदनाओं, उसके संघर्षों, उसके मौन और उसकी पीड़ा को भी महसूस करने लगता है।

यह वह अवस्था है जहाँ व्यक्ति दूसरे के सुख में प्रसन्न और उसके दुःख में व्यथित होने लगता है। उसका हृदय अधिक संवेदनशील हो जाता है। अब प्रेम केवल पाने की इच्छा नहीं रहता; वह दूसरे के अस्तित्व को अपने जीवन का हिस्सा मानने लगता है।

भावनात्मक जुड़ाव मनुष्य को भीतर से परिवर्तित करता है। वह अधिक धैर्यवान, अधिक सहानुभूतिपूर्ण और अधिक करुणामय बनने लगता है। ‘मैं’ और ‘तुम’ के बीच की दूरीकम होने लगती है। प्रेमी को यह अनुभव होने लगता है कि उसका जीवन अब केवल उसका निजी जीवन नहीं रहा; उसमें किसी और की धड़कनें भी सम्मिलित हो गई हैं।
इसी अवस्था में विश्वास जन्म लेता है। व्यक्ति अपने सबसे गहरे भय, अपनी कमजोरियाँ और अपने स्वप्न दूसरे के सामने खोलने लगता है। वह अपने भीतर के उस क्षेत्र को भी साझा कर देता है जिसे वह संसार से छिपाकर रखता था।

किन्तु यहीं से एक सूक्ष्म ख़तरा भी जन्म लेता है—अपेक्षाओं का। जब प्रेम के साथ अधिकार जुड़ने लगता है, तब व्यक्ति बदले में प्रेम, ध्यान और सम्मान की आशा करने लगता है। यदि ये अपेक्षाएँ पूरी नहीं होतीं, तो वही प्रेम पीड़ा का कारण बन जाता है। यही वह मोड़ है जहाँ इश्क़ अपनी अगली परीक्षा की ओर बढ़ता है।

इश्क़ का तीसरा आयाम संघर्ष और परिपक्वता का आयाम है। यहाँ प्रेम केवल मधुर अनुभूति नहीं रहता; वह जीवन की कठोर वास्तविकताओं से टकराने लगता है। बाहरी परिस्थितियाँ, सामाजिक बंधन, व्यक्तिगत असुरक्षाएँ, अहंकार, भय और समय—ये सब इश्क़ को चुनौती देते हैं।

यही वह अवस्था है जहाँ यह स्पष्ट होता है कि प्रेम केवल पाने की आकांक्षा है या देने की क्षमता भी। संघर्ष के बिना प्रेम अधूरा रहता है, क्योंकि संघर्ष ही प्रेम को गहराई प्रदान करता है।

कभी परिस्थितियाँ दो व्यक्तियों को दूर कर देती हैं, कभी गलतफहमियाँ संबंधों में दरार पैदा कर देती हैं, और कभी व्यक्ति अपने भीतर के भय से ही हारने लगता है। पर जो प्रेम इन कठिनाइयों के बीच भी जीवित रहता है, वही परिपक्व होने लगता है।

परिपक्व इश्क़ व्यक्ति को यह सिखाता है कि प्रेम केवल भावुकता नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व भी है। इसमें त्याग है, धैर्य है, और दूसरे की आवश्यकताओं को समझने की क्षमता है। यहाँ व्यक्ति अपने अहंकार को धीरे-धीरे कम करने लगता है। वह समझता है कि संबंध केवल अधिकार से नहीं, बल्कि विनम्रता और स्वीकार से जीवित रहते हैं।
संघर्ष व्यक्ति को भीतर से परिष्कृत करता है। जैसे अग्नि सोने की अशुद्धियों को जला देती है, वैसे ही जीवन की कठिनाइयाँ प्रेम की अपरिपक्वता को नष्ट कर देती हैं। जो इश्क़ इस अग्नि से गुजरता है, वही स्थायी बन पाता है।

जब प्रेम संघर्षों से गुजरकर परिपक्व हो जाता है, तब वह धीरे-धीरे निःस्वार्थता की ओर बढ़ता है। यह इश्क़ का चौथा आयाम है। यहाँ प्रेम अब किसी प्राप्ति की आकांक्षा नहीं रहता। व्यक्ति प्रेम करता है क्योंकि प्रेम करना ही उसका स्वभाव बन जाता है।

निःस्वार्थ इश्क़ में व्यक्ति बदले में कुछ पाने की अपेक्षा नहीं रखता। उसका प्रेम किसी प्रतिक्रिया पर निर्भर नहीं रहता। यदि प्रिय साथ हो, तब भी प्रेम बना रहता है; यदि दूर हो, तब भी प्रेम की ज्योति बुझती नहीं।

यह अवस्था अत्यंत दुर्लभ है, क्योंकि यहाँ प्रेम अधिकार से मुक्त हो जाता है। व्यक्ति दूसरे को बाँधना नहीं चाहता; वह केवल उसके अस्तित्व की मंगलकामना करता है। उसका सुख अब केवल व्यक्तिगत नहीं रहता, बल्कि प्रिय के कल्याण में परिवर्तित हो जाता है।

निःस्वार्थ प्रेम व्यक्ति को भीतर से स्वतंत्र करता है। अब उसकी शांति किसी बाहरी व्यवहार पर निर्भर नहीं रहती। वह अपने प्रेम में स्थिर हो जाता है। यही कारण है कि निःस्वार्थ इश्क़ एक प्रकार की साधना बन जाता है।

यह प्रेम व्यक्ति के भीतर करुणा और विस्तार को जन्म देता है। वह धीरे-धीरे समझने लगता है कि प्रेम का वास्तविक अर्थ अधिकार नहीं, समर्पण है।

जब प्रेम पूरी तरह से स्वार्थ से मुक्त हो जाता है, तब वह भक्ति में रूपांतरित होने लगता है। यह इश्क़ का पाँचवाँ आयाम है। यहाँ प्रेम किसी व्यक्ति विशेष तक सीमित नहीं रहता, बल्कि एक उच्चतर सत्ता की ओर उन्मुख हो जाता है। भक्ति केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं है। यह चेतना की वह अवस्था है जहाँ व्यक्ति अपने प्रेम को दिव्यता में समर्पित कर देता है। सूफ़ियों ने इसी अवस्था को “इश्क़-ए-हक़ीकी” कहा है।

अब प्रेम का केंद्र बदल जाता है। व्यक्ति अपने प्रिय में ईश्वर का दर्शन करने लगता है। उसके लिए समस्त सृष्टि दिव्य उपस्थिति से भर उठती है। वृक्षों की हरियाली, नदी का प्रवाह, आकाश की नीरवता—सबमें उसे उसी प्रिय का स्पर्श अनुभव होने लगता है। भक्ति व्यक्ति को गहरी शांति प्रदान करती है। अब उसका हृदय शिकायतों से मुक्त हो जाता है। वह जीवन को स्वीकार करना सीख जाता है। सुख और दुःख दोनों उसके लिए ईश्वर के प्रसाद बन जाते हैं। इस अवस्था में प्रेम और अध्यात्म एक हो जाते हैं। व्यक्ति समझने लगता है कि प्रेम का अंतिम उद्देश्य किसी व्यक्ति को पाना नहीं, बल्कि स्वयं को खो देना है।

इश्क़ का अंतिम और सर्वोच्च आयाम सार्वभौमिकता है। यहाँ प्रेम किसी व्यक्ति, किसी धर्म, किसी सीमा या किसी संबंध तक सीमित नहीं रहता। वह समस्त अस्तित्व में फैल जाता है।

व्यक्ति अब हर जीव में उसी चेतना को अनुभव करने लगता है। उसे यह प्रतीत होता है कि सम्पूर्ण सृष्टि एक ही विराट सत्ता की अभिव्यक्ति है। ‘मैं’ और ‘तुम’ का भेद समाप्त होने लगता है।

यह अनुभव केवल बौद्धिक नहीं होता; यह अस्तित्वगत अनुभूति होती है। व्यक्ति स्वयं को प्रकृति, समाज और सम्पूर्ण ब्रह्मांड से जुड़ा हुआ महसूस करता है। अब वह किसी से अलग नहीं रहता।

सार्वभौमिक इश्क़ में करुणा स्वतः जन्म लेती है। व्यक्ति केवल मनुष्यों से ही नहीं, बल्कि पशुओं, वृक्षों, नदियों और पृथ्वी तक से प्रेम करने लगता है। उसका हृदय समस्त जीवन के प्रति आदर से भर उठता है।

यही वह अवस्था है जिसे संतों, सूफ़ियों और मनीषियों ने सर्वोच्च सत्य कहा है। यहाँ प्रेम शुद्ध, स्वतंत्र और अनंत हो जाता है। उसमें कोई अपेक्षा नहीं रहती, कोई भय नहीं रहता, कोई सीमा नहीं रहती।

इसी अवस्था में मनुष्य यह अनुभव करता है कि प्रेम ही अस्तित्व का मूल तत्व है। समस्त सृष्टि उसी प्रेम की अभिव्यक्ति है। वही प्रेम चेतना बनकर धड़कता है, वही करुणा बनकर बहता है, और वही आनंद बनकर जीवन को अर्थ प्रदान करता है।

अंततः इश्क़ केवल दो व्यक्तियों के बीच का संबंध नहीं, बल्कि आत्मा की वह अनंत यात्रा है जो मनुष्य को सीमित अहंकार से उठाकर विराट चेतना तक पहुँचा देती है। यह यात्रा आकर्षण से आरंभ होकर सार्वभौमिक प्रेम में समाप्त नहीं होती, बल्कि वहीं से एक नए, शाश्वत आरंभ का -द्वार खुलता है।

इश्क़ का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और सूक्ष्म परिणाम सृजन है। प्रेम केवल हृदय को स्पंदित ही नहीं करता, वह मनुष्य की सुप्त रचनात्मक शक्तियों को भी जागृत कर देता है। जब कोई व्यक्ति सचमुच प्रेम में होता है, तब उसके भीतर भावनाओं का ऐसा ज्वार उठता है, जिसे केवल मौन में बाँधकर रखना संभव नहीं होता। वह किसी न किसी रूप में अभिव्यक्ति खोजने लगता है। यही कारण है कि संसार की महान कविताएँ, अमर गीत, कालजयी चित्रकृतियाँ और अनगिनत साहित्यिक रचनाएँ प्रेम की अग्नि में ही जन्मी हैं।
प्रेम व्यक्ति की दृष्टि को बदल देता है। साधारण वस्तुएँ भी उसे असाधारण प्रतीत होने लगती हैं। एक साधारण वर्षा में भी उसे संगीत सुनाई देता है, किसी संध्या के रंगों में उसे किसी की स्मृतियाँ दिखाई देती हैं, और किसी मौन क्षण में उसे सम्पूर्ण ब्रह्मांड का रहस्य झलकने लगता है। इश्क़ कल्पना को विस्तार देता है। यह मनुष्य को भीतर से अधिक जीवंत, अधिक संवेदनशील और अधिक सौंदर्यबोध सम्पन्न बना देता है।

जब हृदय प्रेम से भर जाता है, तब शब्दों में कविता उतरने लगती है। संगीत में करुणा और माधुर्य घुल जाता है। चित्रों में रंगों के पीछे छिपी भावनाएँ बोलने लगती हैं। प्रेम केवल कला को जन्म नहीं देता, बल्कि जीवन को भी एक कला बना देता है। प्रेम में पड़ा हुआ व्यक्ति अपने व्यवहार, अपने विचार और अपने संबंधों में एक नई कोमलता अनुभव करने लगता है। इस प्रकार इश्क़ केवल भावनात्मक अनुभूति नहीं, बल्कि सृजनात्मक ऊर्जा का महान स्रोत भी है।

इसी प्रकार इश्क़ का एक अन्य परिणाम सामाजिकता है। सामान्यतः प्रेम को केवल दो व्यक्तियों के बीच का संबंध मान लिया जाता है, परंतु उसका प्रभाव इससे कहीं अधिक गहरा और व्यापक होता है। प्रेम व्यक्ति को दूसरों के दुःख के प्रति संवेदनशील बनाता है। जो व्यक्ति सचमुच प्रेम करना सीख लेता है, वह केवल अपने प्रिय तक सीमित नहीं रहता; उसका हृदय धीरे-धीरे समस्त मानवता के लिए खुलने लगता है।

प्रेम मनुष्य के भीतर करुणा को जन्म देता है। वह दूसरों की पीड़ा को केवल देखता नहीं, बल्कि उसे महसूस करने लगता है। यही संवेदना आगे चलकर सेवा, परोपकार और सामाजिक उत्तरदायित्व में परिवर्तित होती है। इतिहास में अनेक ऐसे महापुरुष हुए हैं जिनके भीतर मानवता के प्रति गहरा प्रेम था, और उसी प्रेम ने उन्हें समाज के कल्याणके लिए समर्पित कर दिया।

यदि मनुष्य के भीतर प्रेम न हो, तो समाज केवल नियमों और स्वार्थों का एक यांत्रिक ढाँचा बनकर रह जाए। प्रेम ही वह शक्ति है जो मनुष्यों को जोड़ती है, उन्हें सह-अस्तित्व का बोध कराती है, और उन्हें यह सिखाती है कि जीवन केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों का नाम नहीं, बल्कि सामूहिक उत्कर्ष की यात्रा भी है। इस दृष्टि से इश्क़ सामाजिक परिवर्तन की भी एक महत्वपूर्ण शक्ति है।

किन्तु इश्क़ का संसार केवल मधुरता और सौंदर्य से भरा हुआ नहीं है। उसका एक अत्यंत चुनौतीपूर्ण आयाम वियोग और पीड़ा का भी है। प्रेम जितना गहरा होता है, उससे उत्पन्न होने वाली पीड़ा भी उतनी ही गहरी हो सकती है। जब प्रिय दूर हो जाता है, जब संबंधों में दूरी आ जाती है, या जब अपेक्षाएँ टूटती हैं, तब हृदय एक ऐसे रिक्तता-बोध से गुजरता है जिसे शब्दों में व्यक्त करना कठिन होता है।

वियोग मनुष्य को भीतर तक हिला देता है। कभी-कभी यह पीड़ा इतनी तीव्र होती है कि व्यक्ति स्वयं को टूटता हुआ अनुभव करता है। परंतु यही पीड़ा इश्क़ की सबसे बड़ी शिक्षक भी बन सकती है। विरह मनुष्य को आत्मचिंतन की ओर ले जाता है। वह अपने भीतर झाँकने लगता है और यह समझने का प्रयास करता है कि उसके प्रेम की वास्तविक प्रकृति क्या थी।

वियोग का अनुभव यह सिखाता है कि प्रेम केवल मिलन का नाम नहीं है। यदि प्रेम केवल साथ रहने पर ही जीवित रहे, तो वह परिस्थितियों का बंधक बन जाता है। सच्चा प्रेम दूरी में भी जीवित रहता है। विरह में प्रेम का स्वरूप और भी सूक्ष्म हो जाता है। प्रिय की अनुपस्थिति में भी उसकी स्मृतियाँ, उसकी अनुभूतियाँ और उसका प्रभाव व्यक्ति के भीतर जीवित रहते हैं।

भारतीय और सूफ़ी साहित्य में विरह को अत्यंत ऊँचा स्थान दिया गया है। मीरा, राधा, चैतन्य और सूफ़ी संतों ने विरह को प्रेम की पराकाष्ठा माना, क्योंकि विरह में प्रेम अपनी बाहरी आकांक्षाओं से मुक्त होकर अधिक शुद्ध और अधिक आध्यात्मिक बन जाता है। मिलन में जहाँ प्रेम का आनंद है, वहीं विरह में उसकी गहराई है।

वियोग मनुष्य को यह भी सिखाता है कि जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं है। सब कुछ परिवर्तनशील है। यह समझ व्यक्ति को अधिक परिपक्व बनाती है। वह धीरे-धीरे यह जानने लगता है कि प्रेम का अर्थ किसी को पकड़कर रखना नहीं, बल्कि उसके अस्तित्व का सम्मान करना है।

अंततः इश्क़ एक ऐसी यात्रा है जो कभी समाप्त नहीं होती। यह निरंतर विकसित होती रहती है। हर व्यक्ति इसे अपने ढंग से अनुभव करता है, और इसलिए इश्क़ का कोई एक निश्चित स्वरूप नहीं हो सकता। किसी के लिए यह मधुर स्मृति है, किसी के लिए तपस्या, किसी के लिए भक्ति, और किसी के लिए सम्पूर्ण अस्तित्व के साथ एकता का अनुभव।

यह यात्रा मनुष्य को अपने भीतर झाँकने का अवसर देती है। वह अपनी सीमाओं, अपने भय, अपनी इच्छाओं और अपनी कमजोरियों को पहचानने लगता है। प्रेम व्यक्ति के भीतर छिपे हुए रिक्त स्थानों को उजागर करता है, और उन्हें भरने की प्रेरणा भी देता है।

इश्क़ हमें यह सिखाता है कि सच्चा सुख बाहरी वस्तुओं, उपलब्धियों या अधिकारों में नहीं, बल्कि आंतरिक संतुलन और प्रेम में है। जब व्यक्ति अपने भीतर प्रेम का स्रोत खोज लेता है, तब वह परिस्थितियों का दास नहीं रहता। उसका आनंद किसी बाहरी घटना पर निर्भर नहीं करता।

इश्क़ के इन विविध आयामों को समझना केवल एक बौद्धिक प्रक्रिया नहीं है। इसे केवल पुस्तकों से नहीं जाना जा सकता। प्रेम का वास्तविक ज्ञान अनुभव से आता है। जब मनुष्य स्वयं प्रेम की अग्नि से गुजरता है, तभी वह उसकी गहराई, उसकी पीड़ा, उसकी सुंदरता और उसकी दिव्यता को समझ पाता है। इसीलिए कहा गया है कि इश्क़ को समझा नहीं जा सकता, केवल जिया जा सकता है। यह अनुभव जितना रहस्यमय है, उतना ही परिवर्तनकारी भी। यह मनुष्य को उसकी सीमित चेतना से उठाकर एक व्यापक अस्तित्व से जोड़ देता है। अंततः इश्क़ मनुष्य को पूर्णता की ओर ले जाता है। यह उसे संवेदनशील बनाता है, उसे विनम्र बनाता है, उसे करुणामय बनाता है। यह उसके भीतर छिपी हुई मनुष्यता को जागृत करता है। और शायद इश्क़ की सबसे गहरी सच्चाई यही है कि वह कभी पूरी तरह शब्दों में बाँधा नहीं जा सकता। वह एक ऐसी अनुभूति है जो शब्दों से परे है—जीवन का सार, चेतना का संगीत, और अस्तित्व की वह दिव्य शक्ति जो मनुष्य को उसकी सीमाओं से परे ले जाकर अनंत के स्पर्श तक पहुँचा देती है।

– शेखर

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इश्क, प्रेम, प्यार …

उसूलों की ख़ातिर अलग राह पकड़ी,
वो रूठा हुआ यार कितना हसीं है.

ज़माने में अक्सर यही तो दिखा है,
किसी को सजाने (बनाने) में कोई मिटा है.

ज़ुबां जानते हैं वो जुम्बिश की भी,
मेरे नाम पे कसमसाया न कर.

उसी को ढूँढ़ते हैं हम सभी में,
जो अब तक हो सका हासिल नहीं है.

किया है इश्क़ इतनी सादगी से,
कभी लगता है आशिक़, बेवफ़ा-सा.

ख़यालों में जो इक चेहरा बसा है,
उसे देखा नहीं, सोचा बहुत है।

तबीयत है, मचलना चाहती है,
वो ख़तरों से उलझना चाहती है.

नई तहज़ीब की, सूरत है, वो, अब,
खुलेपन में लगे है बेवफ़ा-सा.

न बोले देर तक आपस में वो, पर,
लगा हर लम्हा जैसे बोलता-सा

मिला जो जख़्म मुझको इश्क़ में वो,
कसकता है, मगर अच्छा बहुत है।

मेरे इक ख़ास की जिंदादिली है,
मिला हर बार पहली मर्तबा-सा.

रहें रानाइयाँ क़ायम तुम्हारी,
ठहर जाए ज़माना, चाहता हूँ.

हमारे इश्क़ की मंज़िल की ख़ातिर,
अज़ल से वो हुआ जल्वानुमा है.

अभी तक जी रहे मुझमें कई संसार माज़ी के,
रुला देते हैं कुछ तो आज भी किरदार माज़ी के

तुम्हारी ज़िंदगी में भी खिलेंगे फूल खुशियों के,
तुम्हें भी इश्क़ की दौलत अगर इनआम हो जाए.

तुम्हारे दिल की चुग़ली कर रहीं खोई सी ये आँखें,
दिलों का राज़ होता है अयाँ, क़स्दन छुपाने से.

तुम्हारे वश में था सब कुछ, कहाँ ये कह रहे हैं हम,
अगर कोशिश ही की होती तो दिल टूटा नहीं होता.

मेरी मजबूरियाँ समझो मुझे ख़ामोश रहने दो,
वफ़ा बदनाम होती है, अगर यह आम हो जाए.

हमारा प्यार हमसे कुछ अगर रूठा नहीं होता,
तो हमने इश्क़ के उन्वान को जाना नहीं होता.

उससे इतनी ही शिकायत है अब,
कुछ कभी वो भी शिकायत करता.

आप भी हो गए हमीं जैसे,
बाज़ आए न आज़माने से.

आस तुमसे भी कुछ रखूँ क्योंकर?
इश्क मेरा न जी-हुजूरी है.

इम्तिहानों से कब मिली फ़ुर्सत,
ख़ूब क़िस्मत लिखा के बैठा हूँ.

इश्क़ अक्सर फ़रेब देता है
ख़त्म पर सिलसिला नहीं होता

इश्क़ का रोग लग गया तब तो,
काम करती कहाँ दवा यारो.

इश्क़ में कुछ मज़ा नहीं होता,
उनसे जब फ़ासला नहीं होता,

इश्क़ का दर्द ही वो दर्द है जो,
कुछ भी हो, बेमज़ा नहीं होता.

इश्क़ करना सिखा दिया तुमने,
क्या बचा सीखना ज़माने से.

इश्क़ में अब ख़बर नहीं “शेखर”,
दर्द होता है, या नहीं होता.

इश्क़ में गर सिला न कुछ चाहा,
आशिक़ी वो तो बंदगी- सी है.

डाल कर एक वो नज़र तुमने,
ज़िंदगी भर उसे वसूल किया.

ढाल-तलवार पास रख कर ही,
साथ अपनों के रह सका हूँ मैं.

ढूँढ़ता हूँ मैं सब के चेहरों में,
ऐसी मूरत बना के बैठा हूँ.

तुम नहीं जान पाए क्या अब तक
इश्क़ का कुछ सिला नहीं होता

दर्द-ए-दिल एक बार उट्ठा तो,
मौत से भी जुदा नहीं होता.

दाग़ दामन पे हों न जिसके कुछ,
ऐसा कोई, न मान्यवर देखा.

दोस्त मेरी ख़बर नहीं रखते,
अब ख़बर दोस्तों की ली जाए.

दिल-लगी, दिल्लगी नहीं ‘शेखर’,
रोजोशब की ख़ुशी भुलाती है.

दोस्ती आज़मा के बैठा हूँ,
सबको दुश्मन बना के बैठा हूँ,

पूछ कर उनसे हम उठें बैठें,
ज़िन्दगी ऐसे तो न जी जाए।

बात अब ख़त्म भी हो जल्वों की,
तज़किरों से भला नहीं होता.

रात दिन के उलाहनों से बड़ी,
प्यार की एक बात होती है.

रू-ब-रू कह सका न जो उनसे,
वो ही ग़ज़लों में ढल गया होगा।

राज़ ये जानना ज़रूरी है,
इश्क़ बिन ज़िन्दगी अधूरी है.

हुस्न की सादगी में भी “शेखर”,
इश्क़ की कायनात होती है.

हुस्न गर बोलता है सिर चढ़ के,
इश्क़ भी कब छुपा छुपाने से.

उम्र लगता है मैं बस वही जी सका,
जो बितायी कभी आशिक़ी में सनम.

ख़्वाहिशें सब मिटीं एक इसके सिवा,
बात कहनी है इक आपकी, आपसे.

जब से मैंने ग़ज़ल इश्क़ पर इक कही,
इश्क़ जीवन का ही क़ाफ़िया हो गया.

ढूँढते हैं, उसे हम, सभी में सदा,
ज़ेह्न में वो जो इक शक्ल तारी रही.

भूल सकते नहीं ज़िन्दगी में सनम,
रूप खिलता है जो सादगी में सनम,

मैं उसूलों के रस्ते पे चलता रहा,
ख़ास बनता था जो, और का हो गया.

मैं किसी का ज़रा ख़ास क्या हो गया,
दोस्त बनता था जो, वो ख़फ़ा हो गया।

याद आते थे तुम ही तो हर बात में,
थी ग़ज़ब की कशिश, दुश्मनी में सनम.

सच भी छोड़ा अरे! हमने उसके लिए,
फिर भी जाने वो क्यों बेवफ़ा हो गया।

सर्द जब भी हुए हैं मरासिम कभी,
रास्ते खुल गए शाइरी के लिए.

साथ तनहाइयाँ तब कहाँ रह सकीं,
याद कुछ जिस घड़ी आप की आ गई.

साथ देने को जब आप राज़ी हुए,
साथ देने को तब हर खुशी आ गई.

आपको चाहा है हमने,
शेष अब क्या चाहना है.

मूल्य क्या है कुछ बताओ,
यार, आँखों की नमी का.

दुश्मनी से जान पाए,
क्या है ‘शेखर’ क़द किसी का.

प्रेम में गर चाह है तो,
प्रेम कब? सौदा हुआ है.

आजतक उसको मनाते ही रहे,
प्रेमिका-सी ज़िन्दगी, नाराज़ है.

आह से ऐ दोस्तो दुनिया बनी,
चाह से इस को सजाना चाहिए.

और कुछ सुनने को हम राजी कहाँ,
कान में जब प्रेम की झंकार है.

इश्क़ का ही दोस्तों है ये सिला,
ज़िंदगी में इक क़रीना आ गया.

इश्क़ होता है मिलन के वास्ते, पर,
आशिक़ी कुछ फ़ासला भी चाहती है.

क्या ग़ज़ब ऋतुराज का श्रृंगार है,
झूमता मदहोश सा संसार है.

ग़म को जिसने चाँद से साझा किया,
चाँद में महबूब पाया आजतक.

ग्रन्थ सारे मिल के कब समझा सके
चीज़ क्या है नाम जिसका प्यार है.

ज़र्रे, ज़र्रे में जो दिखता है लगाव,
ज़िन्दगी का इसमें इंगित सार है.

चंद लम्हे पास रह के, वो गए,
हम उन्हें सोचा किए सोचा किए.

चाहतों की लौ जलानी चाहिए,
ज़िंदगी की लौ बचाने के लिए.

छोड़ के हमको गए वो जिस तरफ़,
हम उधर देखा किए देखा किए.

जब मिले फ़ुरसत, समझ लेना उसे,
बात जो मैं कह न पाया आजतक.

ज़र्रे-ज़र्रे में कशिश है, प्यार है,
प्यार ही संसार का आधार है.

ढूँढते हो प्रेम का कारण अबस,
प्रेम का बस प्रेम ही आधार है.

तुम अभी से प्रेम में घबरा गए,
इस सफ़र में कष्ट अपरम्पार है.

तुम बहक सकते हो कुछ सँभलो ज़रा,
मेरे वश में दिल कहाँ अब यार है.

दाम मय के गिर गए बाज़ार में,
जब से उन आँखों के मैख़ाने लगे.

पतझड़ों की आहटों के बीच भी,
हरतरफ़ बस प्रेम का इज़हार है.

प्रेम भाषा बंधनों से है परे,
प्रेम तो बस भाव का संसार है.

प्रेम में इन्कार भी इक़रार है,
बोलिए क्या आपको इन्कार है.

प्रेम में दुनिया समायी है मेरे,
चर-अचर हर शय से मुझको प्यार है.

प्रेम से अस्तित्व में आया जहां,
प्रेम ही संसार का आधार है.

प्रेम से दुनिया बनी औ चल रही,
प्रेम ही संसार का आधार है.

मशवरे के वास्ते आये हो तुम,
प्रेम में हर मशवरा बेकार है.

शर्त कोई प्रेम में होती नहीं,
तर्क के आगे का ये संसार है.

बात कितनी भी करूँ लगता है मुझको,
है बहुत जो कह न पाया हमसफर से.

मार्बल के घर की अब उनको ज़रुरत है,
वो न रहना चाहते हैं दिल के खानों में.

इश्क़ गर तुमको हुआ है, भूल तुम सकते नहीं,
मानते भूली जिसे, वो फिर कहानी देखिए।

इश्क़ जो पहला है, वो तो, याद आता है सदा,
हर कहानी कह रही ये ही कहानी देखिए.

इश्क़ में महबूब-ओ-आशिक़ में रहा है फ़र्क़ कब?
हाँ कभी राँझा, कभी ये हीर सी होती ग़ज़ल।

इश्क़ जितने भी करो, मर्ज़ी तुम्हारी है, मगर,
इश्क़ पहला सा नहीं होता दुबारा, देखना.

क्या ग़जब का दोस्तो, है इश्क़ का अंदाज़ भी,
फ़ासले महसूस होते कुर्बतों के दर्मियां।

कश्मकश जो थी तुम्हारी, याद आती बारहा,
देखकर मुझको, दुपट्टे का किनारा देखना।

ज़िक्र से महबूब की तस्वीर सी होती ग़ज़ल,
फ़िक्र से सारे जहां की पीर सी होती ग़ज़ल।

भूल मैं सकता नहीं, उस लम्हे को ताउम्र अब,
सबकी नज़रों को बचा कर वो तुम्हारा देखना।

लब हिलाने की ज़रूरत भी कहाँ हमको हुई,
बस नज़र ने ही नज़र से कह दिया सब, इश्क़ में.

वो मिलें या दूर हों, मिलता कहाँ है चैन अब ?
राहतें किसको मिली हैं, चाहतों के दर्मियां ?

कर दिया मुझको मुकम्मल, यार की मोहक हँसी ने,
इस हँसी को दे दिया है, रूप मेरी शायरी ने।

क्यों हुस्नो-इश्क़ की ही ग़ज़ल बस सुना रहा ?
आपातकाल में तो ये अशआर छोड़ दे।

तिनकों सी दिख रही है यहाँ से हर एक शय,
ऊँचाइयों पे इश्क़ जहाँ ले गया मुझे।

देखा जो आइना तो नज़र आ सका न कुछ,
कोई मुझी से आज चुरा ले गया मुझे।

देखे न जानबूझ के जब वो मेरी तरफ़,
तो ज़िन्दगी लगी कि वहीं पे रुकी रही।

सम्मोहन से मुक्त हुए कब,
जबसे देखा उसको पल भर।

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