अनिश्चितताओं के महासागर में मनुष्य की नाव
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड असंख्य कणों, ऊर्जाओं, शक्तियों, जीवों, विचारों और घटनाओं का एक ऐसा गतिशील तंत्र है जिसमें कुछ भी पूर्णतः पृथक् या स्वतंत्र नहीं है। प्रत्येक कण किसी न किसी रूप में दूसरे कण को प्रभावित करता है और स्वयं भी उससे प्रभावित होता है। प्रत्येक क्षण असंख्य परिवर्तन घटित हो रहे हैं। पृथ्वी अपनी धुरी पर घूम रही है, सूर्य की परिक्रमा कर रही है, सौरमण्डल आकाशगंगा में गतिमान है, आकाशगंगाएँ भी निरन्तर गति कर रही हैं। वायुमण्डल में अणुओं की गति निरन्तर चल रही है। समुद्र की लहरें उठ रही हैं। पेड़ों की पत्तियाँ हिल रही हैं। सूक्ष्म जीव जन्म ले रहे हैं और नष्ट हो रहे हैं। मानव मस्तिष्क में अरबों न्यूरॉनों के बीच विद्युत-रासायनिक संकेत निरन्तर प्रवाहित हो रहे हैं। समाज में करोड़ों मनुष्य प्रतिक्षण निर्णय ले रहे हैं। बाजार बदल रहे हैं, मौसम बदल रहा है, तकनीक बदल रही है और विचार बदल रहे हैं।
इस प्रकार सम्पूर्ण अस्तित्व एक अत्यन्त जटिल, परस्पर सम्बद्ध और निरन्तर गतिशील व्यवस्था है। इस व्यवस्था में किसी एक घटना का प्रभाव अनेक अन्य घटनाओं तक पहुँचता है। कभी उसका प्रभाव तत्काल दिखाई देता है, कभी वर्षों बाद और कभी किसी दूरस्थ स्थान पर। व्यक्ति के चारों ओर अनिश्चितताओं का एक विशाल महासागर जैसा विद्यमान रहता है, जिसमें उसे अपनी पालवाली नाव को चलाना होता है। वह चाहे जितना बुद्धिमान क्यों न हो, भविष्य की प्रत्येक घटना का पूर्वानुमान नहीं लगा सकता क्योंकि वह उन असंख्य कारणों को कभी पूर्णतः जान ही नहीं सकता जो भविष्य का निर्माण कर रहे हैं।
पूर्ण निश्चितता प्रकृति का नियम नहीं है। प्रकृति संभावनाओं के आधार पर कार्य करती है, पूर्वनिर्धारित मानवीय अपेक्षाओं के आधार पर नहीं। मनुष्य का जन्म कब होगा, किस परिवार में होगा, कौन-सा शिक्षक मिलेगा, कौन-सा मित्र उसके जीवन को प्रभावित करेगा, किस अवसर पर कौन-सी दुर्घटना अथवा सौभाग्य उसका मार्ग बदल देगा—इनमें से अधिकांश बातें उसके नियंत्रण से बाहर होती हैं। किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि मनुष्य असहाय है। यदि बाहरी संसार अनिश्चितताओं का महासागर है, तो मनुष्य का मन और शरीर उसके लिए एक सशक्त नौका भी हैं। इन्हीं के सहारे वह उस महासागर में मार्ग खोज सकता है।
प्रकृति में पूर्ण अलगाव कहीं नहीं है। गुरुत्वाकर्षण प्रत्येक वस्तु को प्रत्येक अन्य वस्तु से जोड़ता है। विद्युतचुम्बकीय बल असंख्य परमाणुओं को बाँधे रखता है। पारिस्थितिकी हमें बताती है कि किसी एक जीव की संख्या बढ़ने या घटने से सम्पूर्ण पारिस्थितिक तंत्र प्रभावित हो सकता है। अर्थशास्त्र में किसी एक देश की आर्थिक नीति विश्व बाजारों को प्रभावित कर सकती है। सूचना प्रौद्योगिकी के युग में किसी एक व्यक्ति द्वारा किया गया एक संदेश कुछ ही क्षणों में करोड़ों लोगों के विचारों और व्यवहार को प्रभावित कर सकता है।
छोटी-सी घटना के दूरगामी परिणामों को समझाने के लिए आधुनिक विज्ञान में अनेक उदाहरण दिए जाते हैं। किसी वन में लगी छोटी-सी आग कुछ दिनों में हजारों वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को प्रभावित कर सकती है। किसी वायरस का सूक्ष्म परिवर्तन सम्पूर्ण विश्व में महामारी का कारण बन सकता है। किसी वैज्ञानिक की छोटी-सी खोज भविष्य की अनेक पीढ़ियों के जीवन को बदल सकती है। इससे स्पष्ट होता है कि संसार केवल वस्तुओं का समूह नहीं, बल्कि परस्पर प्रभावों का एक जीवंत जाल है।
भारतीय दर्शन ने भी हजारों वर्ष पूर्व इसी सत्य को विभिन्न रूपों में व्यक्त किया था। कर्म का सिद्धान्त केवल नैतिक उपदेश नहीं है; वह यह भी संकेत करता है कि प्रत्येक कर्म किसी न किसी परिणाम की श्रृंखला उत्पन्न करता है। उपनिषदों में सम्पूर्ण अस्तित्व की एकात्मता की चर्चा मिलती है। बौद्ध दर्शन का प्रतीत्यसमुत्पाद सिद्धान्त बताता है कि कोई भी वस्तु स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में नहीं रहती; प्रत्येक वस्तु अनेक कारणों और परिस्थितियों पर निर्भर होकर उत्पन्न होती है। आधुनिक प्रणाली-विज्ञान (Systems Science) भी इसी तथ्य को स्वीकार करता है कि जटिल व्यवस्थाओं को केवल उनके पृथक-पृथक भागों से नहीं समझा जा सकता; उनके पारस्परिक सम्बन्धों को भी समझना आवश्यक है।
जब प्रत्येक कण गतिशील है और प्रत्येक कण दूसरे को प्रभावित कर रहा है, तब किसी भी व्यक्ति का भविष्य अनगिनत प्रभावों के संयुक्त परिणाम के रूप में निर्मित होता है। इसलिए जीवन में पूर्ण नियंत्रण की कल्पना करना भ्रांति है। किन्तु उतनी ही बड़ी भ्रांति यह मान लेना भी है कि मनुष्य कुछ कर ही नहीं सकता। वस्तुतः मनुष्य का क्षेत्र सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि अपनी प्रतिक्रिया, अपने विचार, अपने निर्णय, अपने ज्ञान, अपने चरित्र और अपने कर्मों को नियंत्रित करना है।
यहीं से पुरुषार्थ का प्रारम्भ होता है। मनुष्य बाहरी परिस्थितियों का स्वामी नहीं है, किन्तु वह अपने मन का साधक बन सकता है। वह अपने शरीर को स्वस्थ रख सकता है, अपनी बुद्धि को विकसित कर सकता है, अपने विवेक को परिष्कृत कर सकता है और अपने अनुभवों से सीख सकता है। यही उसकी वास्तविक शक्ति है। समुद्र में उठने वाली लहरों पर उसका अधिकार नहीं है, किन्तु अपनी नाव की दिशा पर उसका kuchh अधिकार है। वायु की गति को वह रोक नहीं सकता, किन्तु अपने पालों को उसी के अनुरूप समायोजित कर सकता है।
एक जैसी परिस्थितियों में रहने वाले दो व्यक्तियों की सोचों के परिणाम बिल्कुल भिन्न हो सकते हैं। दोनों के चारों ओर अनिश्चितताओं का वही महासागर होता है, किन्तु एक व्यक्ति भय, भ्रम और निष्क्रियता का शिकार हो जाता है, जबकि दूसरा वही परिस्थितियाँ अवसर में बदल देता है। अन्तर परिस्थितियों में नहीं, बल्कि मन, बुद्धि, ज्ञान, आत्मानुशासन और निर्णय क्षमता में होता है।
मानव मस्तिष्क की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह केवल घटनाओं पर प्रतिक्रिया नहीं करता, बल्कि उनसे सीखता भी है। अनुभव उसकी निर्णय क्षमता को परिष्कृत करते हैं। शिक्षा उसके विवेक को विकसित करती है। अभ्यास उसकी दक्षता बढ़ाता है। नैतिकता उसे समाज का विश्वास दिलाती है। सहयोग उसे ऐसी सामूहिक शक्ति प्रदान करता है जो अकेले सम्भव नहीं होती। इस प्रकार मनुष्य अपने भीतर ऐसी क्षमताएँ विकसित कर सकता है जो बाहरी अनिश्चितताओं के प्रभाव को निरन्तर कम करती जाती हैं।
इसका अर्थ यह नहीं कि सफलता निश्चित हो जाती है। सफलता फिर भी संभाव्यता का विषय रहती है। किन्तु योग्य व्यक्ति सफलता की सम्भावना को सामान्य व्यक्ति की तुलना में कहीं अधिक बढ़ा देता है। यही विज्ञान का भी सिद्धान्त है। कोई भी वैज्ञानिक प्रयोग शत-प्रतिशत सफलता की गारंटी नहीं देता, किन्तु सही ज्ञान, सही विधि और सही तैयारी सफलता की संभावना को अत्यधिक बढ़ा देते हैं। जीवन भी इसी प्रकार कार्य करता है।
मनुष्य का उद्देश्य अनिश्चितताओं को समाप्त करना नहीं होना चाहिए। उसका उद्देश्य अपने ज्ञान, विवेक, चरित्र, स्वास्थ्य, अनुशासन और सतत् प्रयासों के माध्यम से उन अनिश्चितताओं के बीच सर्वोत्तम सम्भव मार्ग का निर्माण करना होना चाहिए। प्रकृति उसे पूर्ण निश्चितता नहीं देती, परन्तु उचित प्रयास करने की स्वतंत्रता अवश्य देती है। यही स्वतंत्रता मानव गरिमा का आधार है और यही सभ्यता की समस्त उपलब्धियों का मूल स्रोत है।
जब मनुष्य इस सत्य को स्वीकार कर लेता है कि संसार एक गतिशील, परस्पर सम्बद्ध और अनिश्चित व्यवस्था है, तब वह भयभीत नहीं होता। वह परिस्थितियों से युद्ध करने के स्थान पर उन्हें समझने का प्रयास करता है। वह परिवर्तन का विरोध नहीं करता, बल्कि उसके साथ स्वयं को विकसित करता है। वह भाग्य की प्रतीक्षा नहीं करता, बल्कि अपने पुरुषार्थ से संभावनाओं की दिशा बदलने का प्रयत्न करता है। धीरे-धीरे वही व्यक्ति अनिश्चितताओं के महासागर में सुरक्षित मार्ग खोज लेता है और अपने जीवन को अर्थ, सफलता तथा संतोष की दिशा में अग्रसर कर देता है।
यही मानव जीवन की सबसे बड़ी कला है—सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को बदल देना नहीं, बल्कि उसके निरन्तर परिवर्तित होते प्रवाह में अपने मन और शरीर का ऐसा विकास करना कि प्रत्येक परिवर्तन हमारे लिए केवल संकट नहीं, बल्कि एक नई संभावना भी बन जाए।
यदि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को एक विशाल जीवित तंत्र के रूप में देखा जाए तो यह स्पष्ट हो जाता है कि कोई भी घटना अकेली नहीं घटती। प्रत्येक घटना के पीछे असंख्य कारण कार्य करते हैं और प्रत्येक घटना स्वयं भविष्य की अनेक घटनाओं का कारण बन जाती है। एक छोटा-सा बीज केवल एक वृक्ष नहीं बनता; वह भविष्य के हजारों बीजों, पक्षियों के आश्रय, मनुष्य के भोजन, वर्षा के चक्र, मिट्टी की उर्वरता और वातावरण की शुद्धता को भी प्रभावित करता है। इसी प्रकार किसी व्यक्ति का एक छोटा-सा निर्णय उसके परिवार, समाज और आने वाली पीढ़ियों तक प्रभाव डाल सकता है। इसलिए संसार कारणों और परिणामों की एक ऐसी अनन्त श्रृंखला है जिसका सम्पूर्ण ज्ञान किसी एक मनुष्य के लिए सम्भव नहीं है।
इसी तथ्य के कारण भविष्य सदैव अनिश्चित रहता है। मनुष्य अपनी बुद्धि से कुछ कारणों को समझ सकता है, कुछ परिणामों का अनुमान लगा सकता है और कुछ जोखिमों को कम कर सकता है, किन्तु सम्पूर्ण व्यवस्था का पूर्ण ज्ञान उसे कभी प्राप्त नहीं हो सकता। यही कारण है कि जीवन में विनम्रता आवश्यक है। जो व्यक्ति यह मान लेता है कि वह सब कुछ जानता है, वह अपनी सबसे बड़ी भूल करता है। ज्ञान का पहला लक्षण यही है कि वह अज्ञान की विशालता का बोध कराता है।
आधुनिक विज्ञान में जटिलता विज्ञान (Complexity Science) इसी सत्य का अध्ययन करता है। यह बताता है कि अनेक सरल नियम मिलकर भी अत्यन्त जटिल परिणाम उत्पन्न कर सकते हैं। अनेक चींटियाँ मिलकर व्यवस्थित कॉलोनी बना लेती हैं। अनेक न्यूरॉन मिलकर चेतना का निर्माण करते हैं। करोड़ों मनुष्यों के छोटे-छोटे आर्थिक निर्णय मिलकर बाजार की दिशा बदल देते हैं। इनमें किसी एक व्यक्ति का पूर्ण नियंत्रण नहीं होता, फिर भी प्रत्येक व्यक्ति का योगदान होता है।
इसी प्रकार मौसम विज्ञान हमें बताता है कि वातावरण में सूक्ष्म परिवर्तन भी भविष्य के मौसम को प्रभावित कर सकते हैं। इसी कारण दीर्घकालीन मौसम की भविष्यवाणी पूर्णतः निश्चित नहीं हो सकती। इसे लोकप्रिय रूप से “बटरफ्लाई इफेक्ट” कहा जाता है—अर्थात् प्रारम्भिक परिस्थितियों में अत्यन्त छोटा परिवर्तन भी भविष्य में बहुत बड़ा अंतर उत्पन्न कर सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि संसार अव्यवस्थित है, बल्कि यह कि उसकी जटिलता इतनी अधिक है कि प्रत्येक सूक्ष्म प्रभाव का पूर्ण हिसाब रखना व्यावहारिक रूप से असम्भव है।
मानव जीवन भी इसी सिद्धान्त पर चलता है। कभी एक पुस्तक जीवन बदल देती है। कभी एक शिक्षक भविष्य बदल देता है। कभी एक असफलता आगे चलकर सबसे बड़ी सफलता का आधार बन जाती है। कभी किसी अपरिचित व्यक्ति की एक छोटी-सी सलाह जीवन की दिशा बदल देती है। यदि हम पीछे मुड़कर देखें तो पाएँगे कि हमारे जीवन के अनेक निर्णायक मोड़ ऐसे थे जिनकी हमने कभी कल्पना भी नहीं की थी।
इसका अर्थ यह नहीं कि जीवन भाग्य का खेल है। इसका अर्थ केवल इतना है कि जीवन संभावनाओं का क्षेत्र है। संभावनाओं के बीच जो व्यक्ति अधिक सजग, अधिक शिक्षित, अधिक अनुशासित और अधिक नैतिक होता है, वह अनुकूल परिणामों की संभावना को बढ़ा देता है।
यहीं मनुष्य के मन की भूमिका प्रारम्भ होती है
मनुष्य का शरीर उसे कार्य करने की शक्ति देता है और मन उसे दिशा देता है। शरीर बिना मन के केवल जैविक संरचना है और मन बिना शरीर के केवल संभावना। दोनों का समन्वय ही व्यक्तित्व का निर्माण करता है। यदि मन भ्रमित है तो शक्तिशाली शरीर भी गलत दिशा में कार्य करेगा। यदि मन स्पष्ट है तो सीमित संसाधनों वाला व्यक्ति भी असाधारण उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकता है।
मानव मस्तिष्क की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सीखने की क्षमता है। पशु भी परिस्थितियों के अनुसार प्रतिक्रिया करते हैं, किन्तु मनुष्य अनुभवों को सिद्धान्तों में बदल सकता है। वह अपने अनुभवों के साथ-साथ दूसरों के अनुभवों से भी सीख सकता है। यही कारण है कि प्रत्येक पीढ़ी को शून्य से आरम्भ नहीं करना पड़ता। ज्ञान का संचय मानव सभ्यता का सबसे बड़ा निश्चित द्वीप है।
जब एक चिकित्सक चिकित्सा का अध्ययन करता है, तो वह हजारों वर्षों के अनुभव का लाभ उठाता है। जब एक अभियंता पुल बनाता है, तो वह उन असंख्य अभियंताओं के ज्ञान पर खड़ा होता है जिन्होंने पहले सफल और असफल दोनों प्रकार के प्रयोग किए। जब कोई न्यायाधीश निर्णय देता है, तो वह केवल व्यक्तिगत बुद्धि से नहीं, बल्कि शताब्दियों की न्यायिक परम्परा से भी मार्गदर्शन प्राप्त करता है।
ज्ञान हमें भविष्य नहीं देता, परन्तु भविष्य का सामना करने की क्षमता अवश्य देता है।
इसी प्रकार अनुशासन भी निश्चितता का निर्माण करता है। यदि कोई विद्यार्थी प्रतिदिन अध्ययन करता है तो परीक्षा का परिणाम भले शत-प्रतिशत निश्चित न हो, किन्तु सफलता की संभावना अवश्य बढ़ जाती है। यदि कोई किसान समय पर भूमि तैयार करता है, उत्तम बीज चुनता है, सिंचाई की व्यवस्था करता है और रोगों से फसल की रक्षा करता है, तो वह वर्षा को नियंत्रित नहीं कर सकता, फिर भी अच्छी उपज की संभावना बहुत अधिक बढ़ा देता है।
इसी प्रकार समाज में नैतिकता का महत्व समझना चाहिए। यदि समाज में अधिकांश लोग सत्य बोलते हैं, अनुबंधों का पालन करते हैं, न्याय का सम्मान करते हैं और विश्वासघात नहीं करते, तो सम्पूर्ण आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था अधिक स्थिर हो जाती है। यदि विश्वास समाप्त हो जाए तो प्रत्येक लेन-देन संदेह का विषय बन जाएगा और समाज की ऊर्जा विकास के स्थान पर सुरक्षा में खर्च होने लगेगी। इसलिए नैतिकता केवल आध्यात्मिक आदर्श नहीं, बल्कि सामाजिक निश्चितता का आधार भी है।
भारतीय दर्शन में ऋत की अवधारणा इसी ओर संकेत करती है। ऋत का अर्थ है—प्रकृति और ब्रह्माण्ड में विद्यमान वह शाश्वत व्यवस्था जिसके कारण समस्त अस्तित्व संचालित होता है। सूर्य का उदय-अस्त, ऋतुओं का परिवर्तन, ग्रहों की गति, जन्म और मृत्यु का चक्र—सब उसी व्यवस्था के अंग हैं। मनुष्य उस व्यवस्था को बदल नहीं सकता, किन्तु यदि वह उसके अनुरूप जीवन जीता है तो उसका जीवन अधिक संतुलित और सफल होता है।
भगवद्गीता का संदेश भी यही है कि मनुष्य का अधिकार कर्म पर है, फल पर नहीं। इसका अर्थ यह नहीं कि फल का महत्व नहीं है। इसका अर्थ यह है कि फल असंख्य कारणों पर निर्भर है, जबकि कर्म मुख्यतः हमारे नियंत्रण में है। इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति अपना ध्यान उन बातों पर केन्द्रित करता है जिन्हें वह सुधार सकता है।
आज के युग में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जैव-प्रौद्योगिकी, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक अर्थव्यवस्था ने अनिश्चितताओं को और भी जटिल बना दिया है। एक देश का निर्णय दूसरे देश के करोड़ों लोगों को प्रभावित कर सकता है। किसी दूर देश का युद्ध विश्व के तेल बाजार को बदल सकता है। किसी प्रयोगशाला की खोज सम्पूर्ण उद्योग जगत को बदल सकती है। ऐसे युग में भविष्य की भविष्यवाणी करने से अधिक आवश्यक है स्वयं को निरन्तर सीखने योग्य बनाना।
यही अनुकूलन (Adaptability) की शक्ति है। जो व्यक्ति बदलती परिस्थितियों के साथ सीखता रहता है, वही दीर्घकाल में सफल होता है। इतिहास में अनेक शक्तिशाली साम्राज्य इसलिए समाप्त हो गए क्योंकि उन्होंने परिवर्तन स्वीकार नहीं किया। वहीं अनेक छोटे समाज इसलिए आगे बढ़े क्योंकि उन्होंने समय के साथ स्वयं को बदल लिया।
मनुष्य के पास सबसे बड़ा साधन उसका विवेक है। विवेक उसे यह निर्णय करने में सहायता करता है कि किन परिस्थितियों को स्वीकार करना है, किन्हें बदलने का प्रयास करना है और किनसे दूर रहना है। विवेक ही ज्ञान को व्यवहार में बदलता है और अनुभव को प्रज्ञा में परिवर्तित करता है।
इस प्रकार अनिश्चितताओं के महासागर में मनुष्य अकेला नहीं है। उसके पास विचार करने वाला मस्तिष्क है, कार्य करने वाला शरीर है, सीखने की क्षमता है, सहयोग करने वाला समाज है, अनुभवों का विशाल इतिहास है और प्रकृति के नियमों को समझने वाला विज्ञान है। यदि वह इन सभी का समुचित उपयोग करे, तो वह प्रत्येक अनिश्चितता को समाप्त भले न कर सके, किन्तु उसके बीच सुरक्षित, सार्थक और सफल जीवन का मार्ग अवश्य खोज सकता है।
जब हम इस सत्य को स्वीकार कर लेते हैं कि प्रत्येक कण दूसरे कण को प्रभावित करता है और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड निरन्तर परिवर्तनशील है, तब हमारे सामने एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण प्रश्न उपस्थित होता है—यदि सब कुछ परिवर्तनशील है और भविष्य पूर्णतः निश्चित नहीं है, तो क्या मनुष्य केवल परिस्थितियों का खिलौना है? क्या उसका पुरुषार्थ, उसकी बुद्धि और उसके प्रयास निरर्थक हैं?
उत्तर स्पष्ट है—नहीं। यदि ऐसा होता, तो मानव सभ्यता का अस्तित्व ही सम्भव नहीं होता। यदि प्रत्येक परिणाम केवल संयोग होता, तो न विज्ञान विकसित होता, न दर्शन, न कला, न न्याय व्यवस्था, न चिकित्सा, न शिक्षा और न ही संस्कृति। वस्तुतः प्रकृति ने मनुष्य को पूर्ण निश्चितता नहीं दी, किन्तु उसे संभावनाओं को प्रभावित करने की क्षमता अवश्य दी है। यही क्षमता मनुष्य को अन्य प्राणियों से विशिष्ट बनाती है।
जीवन को यदि शतरंज की बिसात माना जाए, तो मनुष्य सभी मोहरों की चाल निर्धारित नहीं कर सकता। प्रतिद्वन्द्वी भी अपनी चाल चलता है, परिस्थितियाँ भी बदलती रहती हैं और अनेक घटनाएँ उसकी इच्छा से बाहर होती हैं। किन्तु वह प्रत्येक परिस्थिति में अपनी अगली चाल सोच-समझकर चल सकता है। यही विवेक है। यही पुरुषार्थ है। यही स्वतंत्रता है।
इस संसार में कोई भी व्यक्ति अकेला कार्य नहीं करता। उसके प्रत्येक निर्णय पर परिवार, समाज, संस्कृति, शिक्षा, अर्थव्यवस्था, जलवायु, राजनीति, विज्ञान और असंख्य अदृश्य कारणों का प्रभाव पड़ता है। फिर भी उसी व्यक्ति के विचार, उसके कर्म और उसका चरित्र भी उन सबको प्रभावित करते हैं। इसलिए मनुष्य केवल परिस्थितियों का उत्पाद नहीं है; वह परिस्थितियों का निर्माता भी है। वह जितना संसार से प्रभावित होता है, उतना ही संसार को प्रभावित भी करता है।
इसी कारण इतिहास महान व्यक्तियों को याद रखता है। एक महात्मा गांधी अहिंसा को जनशक्ति में बदल देते हैं। एक आइज़ैक न्यूटन गुरुत्वाकर्षण के नियमों को समझकर विज्ञान की दिशा बदल देते हैं। एक अल्बर्ट आइंस्टीन समय और स्थान की हमारी समझ को परिवर्तित कर देते हैं। एक गौतम बुद्ध मानव मन के दुःख और मुक्ति का ऐसा विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं जो सहस्राब्दियों तक करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित करता है।
इन महापुरुषों ने संसार की समस्त अनिश्चितताओं को समाप्त नहीं किया। उन्होंने केवल अपने भीतर ऐसी स्पष्टता, ऐसा चरित्र और ऐसा ज्ञान विकसित किया कि उनका जीवन स्वयं दूसरों के लिए निश्चितता का स्रोत बन गया।
मनोविज्ञान भी यही बताता है कि किसी व्यक्ति का बाहरी संसार जितना महत्त्वपूर्ण है, उससे अधिक महत्त्वपूर्ण उसका आन्तरिक संसार है। यदि मन भय, भ्रम, क्रोध, ईर्ष्या और निराशा से भरा हो, तो छोटी-सी समस्या भी असहनीय लगती है। इसके विपरीत यदि मन शांत, विवेकशील और आत्मविश्वासी हो, तो बड़ी से बड़ी चुनौती भी सीखने का अवसर बन जाती है।
इसीलिए भारतीय दर्शन में मन को ही बन्धन और मुक्ति दोनों का कारण कहा गया है। बाहरी संसार सदैव परिवर्तनशील रहेगा, किन्तु यदि मन स्थिर है, तो परिवर्तन विनाशकारी नहीं बल्कि रचनात्मक सिद्ध हो सकता है। स्थिर मन परिस्थितियों का सही मूल्यांकन करता है, भावनाओं को नियंत्रित रखता है और निर्णयों में संतुलन बनाए रखता है।
मनुष्य का शरीर भी इस यात्रा में समान रूप से आवश्यक है। दुर्बल शरीर प्रायः दृढ़ संकल्प को भी सीमित कर देता है। स्वस्थ शरीर, संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, पर्याप्त विश्राम और अनुशासित जीवन केवल स्वास्थ्य के साधन नहीं हैं; वे निर्णय क्षमता, धैर्य और कार्यक्षमता के भी आधार हैं। मन और शरीर मिलकर वह नौका बनाते हैं जिसके सहारे मनुष्य अनिश्चितताओं के महासागर में यात्रा करता है।
किन्तु केवल व्यक्तिगत विकास पर्याप्त नहीं है। मनुष्य सामाजिक प्राणी है। परिवार, मित्र, सहयोगी, संस्थाएँ और समाज उसके लिए सुरक्षा का जाल निर्मित करते हैं। विश्वास, सहयोग और न्याय सामाजिक जीवन के वे स्तम्भ हैं जो सामूहिक निश्चितता उत्पन्न करते हैं। जहाँ लोग एक-दूसरे पर विश्वास करते हैं, वहाँ व्यापार सरल होता है, न्याय सुलभ होता है, नवाचार बढ़ता है और समृद्धि आती है। जहाँ अविश्वास, भ्रष्टाचार और हिंसा बढ़ती है, वहाँ अनिश्चितता भी बढ़ती जाती है।
इसीलिए नैतिकता का मूल्य केवल धार्मिक नहीं, बल्कि व्यावहारिक भी है। सत्यनिष्ठा लेन-देन की लागत घटाती है। ईमानदारी विश्वास उत्पन्न करती है। उत्तरदायित्व संस्थाओं को मजबूत बनाता है। अनुशासन समय और संसाधनों की रक्षा करता है। करुणा सहयोग को जन्म देती है। ये सभी मिलकर समाज में निश्चितता के विशाल द्वीप निर्मित करते हैं।
प्रकृति का एक और गहरा संदेश है—लचीलापन (Resilience)। बाँस का वृक्ष आँधी में झुक जाता है, इसलिए टूटता नहीं। कठोर किन्तु अनम्य मजबूत वृक्ष बड़ी आंधी में गिर जाते हैं, जबकि नम्य कमज़ोर घास पर उसका कोई असर नहीं पड़ता। इसी प्रकार जीवन में लचीलापन कमजोरी नहीं, बल्कि बुद्धिमत्ता का प्रतीक है। जो व्यक्ति परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालना सीख लेता है, वही दीर्घकाल में स्थिर रहता है।
वर्तमान युग में यह गुण पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वचालन, बदलती अर्थव्यवस्था, जलवायु परिवर्तन, वैश्विक प्रतिस्पर्धा और तीव्र तकनीकी विकास ने यह स्पष्ट कर दिया है कि स्थायी सफलता केवल उसी व्यक्ति को मिलेगी जो निरन्तर सीखता रहेगा। जो सीखना छोड़ देता है, वह धीरे-धीरे बदलती दुनिया से कटने लगता है।
इसलिए शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं होना चाहिए। उसका उद्देश्य जिज्ञासा, तार्किक चिंतन, समस्या-समाधान की क्षमता, नैतिक विवेक और आजीवन सीखने की प्रवृत्ति विकसित करना होना चाहिए। यही गुण भविष्य की अनिश्चितताओं में सबसे विश्वसनीय मार्गदर्शक बनेंगे।
अन्ततः जीवन की सबसे बड़ी निश्चितता यह है कि अनिश्चितता कभी समाप्त नहीं होगी। यही प्रकृति का नियम है। किन्तु उतना ही बड़ा सत्य यह भी है कि मनुष्य अपनी बुद्धि, विवेक, चरित्र, ज्ञान, अनुशासन और पुरुषार्थ के द्वारा उन अनिश्चितताओं के बीच लगातार निश्चितताओं के नए-नए द्वीप बना सकता है।
जब वह ज्ञान अर्जित करता है, तो अज्ञान का एक भाग समाप्त हो जाता है।जब वह कौशल विकसित करता है, तो असफलता की संभावना घट जाती है। जब वह स्वास्थ्य का ध्यान रखता है, तो अनेक रोगों का जोखिम कम हो जाता है। जब वह नैतिक बनता है, तो समाज का विश्वास अर्जित करता है। जब वह बचत करता है, तो आर्थिक संकटों का प्रभाव कम हो जाता है। जब वह सहयोग करता है, तो अकेलेपन की अनिश्चितता घट जाती है। जब वह धैर्य रखता है, तो कठिन समय भी बीत जाता है। और जब वह निरन्तर सीखता रहता है, तो बदलती दुनिया भी उसके लिए अवसरों का स्रोत बन जाती है।
यही जीवन का शाश्वत संदेश है। मनुष्य का उद्देश्य प्रकृति पर प्रभुत्व स्थापित करना नहीं, बल्कि उसके नियमों को समझकर उनके साथ सामंजस्य स्थापित करना है। वह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को नियंत्रित नहीं कर सकता, किन्तु अपने विचारों को नियंत्रित कर सकता है। वह प्रत्येक घटना को रोक नहीं सकता, किन्तु प्रत्येक घटना से सीख सकता है। वह भविष्य को निश्चित नहीं बना सकता, किन्तु अपने व्यक्तित्व को इतना सुदृढ़ बना सकता है कि भविष्य चाहे जैसा भी हो, वह उसका सामना आत्मविश्वास, साहस और विवेक के साथ कर सके।
इस प्रकार प्रत्येक कण से प्रभावित होने वाले इस विराट, गतिशील और जटिल ब्रह्माण्ड में मनुष्य असहाय नहीं है। वह एक सजग यात्री है। उसका मन उसका दिशा-सूचक यंत्र है, उसका विवेक उसका मानचित्र है, उसका चरित्र उसका लंगर है, उसका ज्ञान उसका प्रकाश-स्तम्भ है और उसका पुरुषार्थ उसकी पतवार है। इन्हीं के सहारे वह अनिश्चितताओं के असीम महासागर में यात्रा करते हुए अपने लिए, अपने परिवार के लिए, समाज के लिए और सम्पूर्ण मानवता के लिए निश्चितताओं के ऐसे द्वीप निर्मित कर सकता है जो जीवन को केवल सुरक्षित ही नहीं, बल्कि सार्थक, रचनात्मक, समृद्ध और आनंदमय भी बना दें।
यही मानव जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है—अनिश्चितताओं से भयभीत होकर रुक जाना नहीं, बल्कि उन्हें समझकर, स्वीकार करके और अपने विवेकपूर्ण पुरुषार्थ से उनके बीच निश्चितता, व्यवस्था, प्रगति और कल्याण के नए द्वीपों का निरन्तर निर्माण करते रहना।
– शेखर
