ग़ज़ल
वीरेन्द्र कुमार शेखर
आबरू शायरी की रखा कीजिए,
दिल से दिल की ग़ज़ल ही कहा कीजिए।
है तमन्ना अगर अब अमन-चैन की,
ख़ुद से ख़ुद तो न अक्सर लड़ा कीजिये।
सब्र करने से ताक़त मिली है सदा,
अश्क़ आँखों से यूँ मत जुदा कीजिये।
उस ने सबको बनाया है सबसे अलग,
साथ धारा के ही मत बहा कीजिये।
अब इसी से मिलेगा सुकूँ, है यकीं,
दर्द हद से बढ़ा, क्या दवा कीजिये।
वक़्त जाया किए फेसबुक पर बहुत,
अस्ल की भी तो इज़्ज़त ज़रा कीजिए।
शोर बाहर का बेशक़ ये, थम जाएगा
दिल की आवाज़ भी कुछ सुना कीजिये।
