साहित्य के रोचक प्रसंग
तुलसीदास और रहीम : लोककथा, इतिहास और भारतीय सांस्कृतिक समन्वय का अमर संवाद
भारतीय साहित्य का वैभव केवल उसकी महान काव्य-कृतियों में ही नहीं, बल्कि उन मानवीय संबंधों में भी निहित है जिन्होंने साहित्य को जीवन से जोड़ा। यदि दो ऐसे व्यक्तित्वों का नाम लिया जाए जिन्होंने भिन्न धार्मिक परम्पराओं में जन्म लेकर भी भारतीय संस्कृति की साझा चेतना को साकार किया, तो गोस्वामी तुलसीदास और अब्दुर्रहीम ख़ान-ए-ख़ाना का नाम अग्रणी होगा। एक ओर रामचरितमानस के अमर रचयिता तुलसीदास हैं, दूसरी ओर मुग़ल सम्राट अकबर के सेनापति नीति-काव्य के अमर कवि रहीम।
अब्दुर्रहीम ख़ान-ए-ख़ाना अपने समय के सबसे बहुभाषी विद्वानों में से एक थे। वे केवल योद्धा और प्रशासक ही नहीं, बल्कि भाषाओं, साहित्य, ज्योतिष और संस्कृति के गहरे अध्येता थे।
उन्हें निम्नलिखित भाषाओं का उत्कृष्ट ज्ञान था—
1. तुर्की (चगताई तुर्की) – यह उनके परिवार की मातृभाषा थी। उनके पिता बैरम ख़ाँ मध्य एशियाई तुर्क मूल के थे। रहीम ने बाबर की आत्मकथा तुज़ुक-ए-बाबरी (बाबरनामा) का चगताई तुर्की से फ़ारसी में अनुवाद कराया/करवाया और स्वयं भी इस भाषा के विद्वान थे।
2. फ़ारसी (Persian) – मुग़ल साम्राज्य की राजभाषा। रहीम फ़ारसी के अत्यन्त उच्चकोटि के कवि और गद्यकार थे। उनके फ़ारसी दीवान और अनेक रचनाएँ उपलब्ध हैं।
3. अरबी – इस्लामी धर्मशास्त्र, क़ुरआन और पारम्परिक शिक्षा के कारण उन्हें अरबी का अच्छा ज्ञान था। वे अरबी साहित्य और धर्मग्रन्थों से परिचित थे।
4. संस्कृत – रहीम संस्कृत के विद्वान थे। उन्होंने संस्कृत पंडितों का संरक्षण किया और ज्योतिष, काव्य तथा शास्त्रीय परम्परा में गहरी रुचि ली। उनके संस्कृत ज्ञान का उल्लेख अनेक विद्वानों ने किया है।
5. ब्रजभाषा – रहीम के अधिकांश प्रसिद्ध दोहे और काव्य ब्रजभाषा में हैं। उनकी भाषा इतनी स्वाभाविक है कि वे हिंदी साहित्य के प्रमुख नीति-कवियों में गिने जाते हैं।
6. अवधी – अवधी की भी उन्हें अच्छी समझ थी। यद्यपि उनकी अधिकांश हिंदी रचनाएँ ब्रजभाषा में हैं, पर उत्तर भारतीय लोकभाषाओं से उनका निकट परिचय था।
7. हिन्दवी / प्रारम्भिक हिन्दी – उस समय “हिन्दवी” या “हिन्दी” उत्तर भारत की बोलचाल और साहित्यिक अभिव्यक्ति का व्यापक नाम था। रहीम इस भाषिक संसार के समर्थ कवि थे।
प्रत्यक्ष प्रमाण सीमित हैं, किन्तु विद्वानों का मत है कि प्रशासनिक जीवन और बहुसांस्कृतिक परिवेश के कारण उन्हें राजस्थानी तथा दक्कनी जैसी कुछ क्षेत्रीय भाषाओं की भी व्यवहारिक जानकारी रही होगी। इसका निश्चित ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है, इसलिए इसे अनुमान की सीमा में ही रखना चाहिए।
रहीम की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने भाषाओं को सत्ता या धर्म का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति का सेतु बनाया। वे फ़ारसी में दरबारी काव्य लिखते हैं, संस्कृत विद्वानों का सम्मान करते हैं और ब्रजभाषा में ऐसे दोहे रचते हैं जो आज भी लोकजीवन में उतने ही लोकप्रिय हैं जितने तुलसी, कबीर और बिहारी के।
इसी कारण रहीम को केवल मुग़ल दरबार का सेनापति नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक समन्वय का महान प्रतिनिधि माना जाता है।
तुलसीदास और रहीम के मध्य सम्मान, स्नेह और बौद्धिक आत्मीयता से जुड़ी अनेक कथाएँ लोकजीवन में प्रचलित हैं। इनमें दो प्रसंग विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं—पहला, एक निर्धन ब्राह्मण की पुत्री के विवाह के लिए सहायता का प्रसंग; दूसरा, दान देते समय रहीम की झुकी हुई दृष्टि पर तुलसीदास और रहीम के बीच दोहों का संवाद।
इन दोनों घटनाओं को प्रायः एक ही कथा मान लिया जाता है, जबकि लोकपरम्परा में ये दो अलग-अलग प्रसंग हैं। इनकी ऐतिहासिक प्रामाणिकता पर विद्वानों में मतभेद अवश्य है, किन्तु इनके भीतर निहित सांस्कृतिक और नैतिक संदेश इतने गहरे हैं कि ये भारतीय मानस की अमूल्य धरोहर बन चुके हैं।
सोलहवीं शताब्दी का भारत राजनीतिक दृष्टि से मुग़ल साम्राज्य का युग था, किन्तु सांस्कृतिक स्तर पर यह भक्ति और सूफ़ी आन्दोलन का स्वर्णकाल भी था। उत्तर भारत में कबीर, सूरदास, तुलसीदास और रहीम जैसे कवि लोकभाषाओं में आध्यात्मिक तथा नैतिक साहित्य का सृजन कर रहे थे। रहीम अकबर के दरबार के प्रमुख सेनापति थे, परंतु उनके दोहों में भारतीय दर्शन, लोकजीवन और भक्ति की अद्भुत छाया मिलती है। तुलसीदास रामभक्ति के महान कवि थे, पर उनकी दृष्टि सम्पूर्ण मानवता पर थी। दोनों के साहित्य में धर्म विभाजन का नहीं, बल्कि मानवीय उत्थान का माध्यम बनता है।
पहला प्रसंग : ब्राह्मण की पुत्री का विवाह
लोककथा के अनुसार एक निर्धन ब्राह्मण अपनी कन्या के विवाह के लिए आर्थिक सहायता चाहता था। वह गोस्वामी तुलसीदास के पास पहुँचा। तुलसीदास स्वयं विरक्त संत थे; उनके पास धन नहीं था। उन्होंने सहायता करने की इच्छा तो प्रकट की, पर साधन न होने के कारण ब्राह्मण को रहीम के पास भेजा।
कहा जाता है कि तुलसीदास ने उसके हाथ एक अधूरी पंक्ति लिख भेजी—
“सुरतिय नरतिय नागतिय, यह चाहत सब कोय…”
रहीम ने पंक्ति पढ़ते ही समझ लिया कि यह तुलसीदास की ओर से आई है। उन्होंने ब्राह्मण को उसकी आवश्यकता से अधिक धन देकर विदा किया और दोहे को पूरा करते हुए लिखा—
“गोद लिए हुलसी फिरै, तुलसी सो सुत होय॥”
यहाँ “हुलसी” तुलसीदास की माता का नाम माना जाता है। रहीम का आशय था कि देवता, मनुष्य और नाग—सभी यही चाहते हैं कि उन्हें तुलसीदास जैसा पुत्र मिले; इसलिए माता हुलसी उन्हें गोद में लेकर गर्व से विचरती होंगी।
यह प्रसंग केवल आर्थिक सहायता का नहीं, बल्कि दो महापुरुषों के पारस्परिक सम्मान का प्रतीक है। तुलसीदास को रहीम की उदारता पर विश्वास था और रहीम को तुलसीदास की महानता पर। यही विश्वास भारतीय सांस्कृतिक जीवन का आधार रहा है।
इतिहासकार यह स्वीकार करते हैं कि इस घटना का प्रत्यक्ष समकालीन प्रमाण उपलब्ध नहीं है। यह कथा मुख्यतः बाद के संत-चरितों और लोकश्रुतियों में मिलती है। अतः इसे ऐतिहासिक तथ्य के बजाय सांस्कृतिक स्मृति के रूप में देखना अधिक उचित होगा।
दूसरा प्रसंग : दान और विनम्रता का संवाद
लोकपरम्परा में इससे भी अधिक प्रसिद्ध दूसरा प्रसंग है। रहीम जब दान देते थे, तो याचक की ओर सीधे न देखकर अपनी आँखें नीचे झुका लेते थे। अनेक लोगों को यह विचित्र लगता था। जब यह बात तुलसीदास तक पहुँची, तो उन्होंने आश्चर्य और प्रशंसा मिश्रित भाव से रहीम को संबोधित करते हुए कहा—
ऐसी देनी देन जू, कित सीखे हो सैन।
ज्यों-ज्यों कर ऊँच्यो करो, त्यों-त्यों नीचे नैन॥
“सैन” अर्थात् सेनापति—रहीम। तुलसीदास पूछते हैं—हे सेनापति! आपने दान देने की यह अद्भुत रीति कहाँ से सीखी? आपका हाथ तो ऊपर उठता है, पर आपकी दृष्टि और अधिक नीचे झुक जाती है।
इस प्रश्न में व्यंग्य नहीं, बल्कि गहरी प्रशंसा छिपी है। तुलसीदास समझना चाहते हैं कि इतनी विनम्रता का स्रोत क्या है।
रहीम ने उत्तर दिया—
देनहार कोई और है, भेजत सो दिन रैन।
लोग भरम हम पर करें, ताते नीचे नैन॥
यह उत्तर भारतीय दर्शन की महानतम शिक्षाओं में से एक है। रहीम कहते हैं कि वास्तविक दाता मैं नहीं, परमात्मा है। वही दिन-रात सबको देता है। लोग भ्रमवश मुझे दाता समझ लेते हैं, इसलिए मैं लज्जा से आँखें नीचे कर लेता हूँ।
यहाँ रहीम केवल विनम्रता का प्रदर्शन नहीं कर रहे; वे अहंकार-त्याग का दर्शन प्रस्तुत कर रहे हैं।
दान का भारतीय दर्शन
भारतीय परम्परा में दान केवल आर्थिक लेन-देन नहीं है; वह आत्मशुद्धि का साधन है। तैत्तिरीय उपनिषद् में कहा गया है—
“श्रद्धया देयम्, अश्रद्धया अदेयम्; ह्रिया देयम्; भिया देयम्; संविदा देयम्।”
अर्थात् श्रद्धा से दान दो, विनम्रता से दान दो, उत्तरदायित्व की भावना से दान दो और विवेकपूर्वक दान दो।
रहीम का आचरण इन उपनिषद्-वचनों का मूर्त रूप प्रतीत होता है। वे दान देकर स्वयं को बड़ा सिद्ध नहीं करना चाहते; वे स्वयं को ईश्वर का माध्यम मानते हैं।
तुलसीदास भी रामचरितमानस में कहते हैं—
परहित सरिस धरम नहिं भाई।
पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥
अर्थात् दूसरों का हित करने से बड़ा कोई धर्म नहीं और दूसरों को पीड़ा देने से बड़ा कोई अधर्म नहीं।
स्पष्ट है कि तुलसी और रहीम दोनों के जीवन-दर्शन में परोपकार सर्वोच्च मूल्य है।
इतिहास और लोककथा
एक गंभीर प्रश्न उठता है—क्या ये घटनाएँ वास्तव में घटी थीं?
उत्तर सरल नहीं है। उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोत इन घटनाओं की स्पष्ट पुष्टि नहीं करते। अधिकांश विवरण बाद की लोकपरम्पराओं में मिलते हैं। इसलिए एक इतिहासकार इन्हें प्रमाणित इतिहास नहीं कहेगा।
किन्तु साहित्य का मूल्य केवल अभिलेखों से निर्धारित नहीं होता। लोककथाएँ समाज के नैतिक आदर्शों का निर्माण करती हैं। यदि किसी कथा ने पाँच सौ वर्षों तक करोड़ों लोगों को यह सिखाया कि दान विनम्रता से करना चाहिए और धर्म से ऊपर मनुष्यता है, तो उसका सांस्कृतिक महत्व असंदिग्ध है।
भारतीय परम्परा में पंचतंत्र, जातक कथाएँ और अनेक पुराण प्रसंग भी इसी कारण जीवित हैं। उनका उद्देश्य घटनाओं का शाब्दिक इतिहास लिखना नहीं, बल्कि जीवन-मूल्यों का संवहन करना है।
सांस्कृतिक समन्वय का आदर्श
तुलसीदास और रहीम की मित्रता भारत की उस परम्परा का प्रतिनिधित्व करती है जिसमें विविध धार्मिक आस्थाएँ विरोध का नहीं, संवाद का आधार बनती हैं। रहीम ने कृष्ण और राम पर भी काव्य लिखा, तो तुलसीदास ने कभी धर्म के आधार पर मनुष्यों का मूल्यांकन नहीं किया।
आज जब समाज में धार्मिक पहचान को लेकर तनाव उत्पन्न होता है, तब यह कथा स्मरण कराती है कि भारतीय सभ्यता का वास्तविक आधार साझा संस्कृति है। यहाँ श्रेष्ठता का मापदण्ड जन्म नहीं, गुण है; सम्प्रदाय नहीं, चरित्र है।
आज दान का स्वरूप बदल गया है। अनेक बार दान प्रचार का साधन बन जाता है। समाचारपत्रों, मंचों और सामाजिक माध्यमों पर उसका प्रदर्शन किया जाता है। ऐसे समय में रहीम का दोहा पहले से अधिक प्रासंगिक हो उठता है। यदि दान अहंकार बढ़ाए, तो उसका आध्यात्मिक मूल्य समाप्त हो जाता है। यदि दान विनम्रता बढ़ाए, तभी वह लोकमंगल का माध्यम बनता है।
इसी प्रकार तुलसीदास का प्रश्न भी आज प्रासंगिक है। समाज को ऐसे दानियों की आवश्यकता है जिनका हाथ ऊपर उठे, पर सिर नहीं।
तुलसीदास और रहीम के इन दोनों प्रसंगों की ऐतिहासिकता चाहे पूर्णतः सिद्ध न हो, किन्तु उनका सांस्कृतिक सत्य निर्विवाद है। ब्राह्मण की पुत्री के विवाह की कथा परस्पर विश्वास और उदारता का संदेश देती है, जबकि “ऐसी देनी देन जू…” और “देनहार कोई और है…” का संवाद विनम्रता और निष्काम सेवा का सर्वोच्च आदर्श प्रस्तुत करता है।
भारतीय संस्कृति का सौन्दर्य इसी समन्वय में है कि रामभक्त तुलसीदास एक मुस्लिम सेनापति-कवि की विनम्रता की प्रशंसा करते हैं और रहीम ईश्वर को ही वास्तविक दाता स्वीकार करते हैं। दोनों मिलकर हमें यह शिक्षा देते हैं कि धर्म का सार मनुष्यता है, दान का सार विनम्रता है और साहित्य का सर्वोच्च उद्देश्य मनुष्य के भीतर करुणा, सद्भाव और आत्मिक उदात्तता का विकास करना है। यही कारण है कि इन दोहों का महत्व केवल साहित्यिक नहीं, बल्कि नैतिक, दार्शनिक और राष्ट्रीय भी है। वे आज भी भारतीय संस्कृति की उस अमर वाणी के रूप में गूँजते हैं जो कहती है—अहंकार नहीं, विनय; प्रदर्शन नहीं, परोपकार; और विभाजन नहीं, समन्वय उच्चतर मानवीय मूल्य हैं।
-शेखर
