इतिहास से अधिक महत्वपूर्ण हैं वर्तमान और भविष्य
मनुष्य स्वयं को एक जागरूक, विवेकशील और वास्तविकता को समझने वाला प्राणी मानता है। उसे विश्वास होता है कि जो कुछ उसकी आँखें देखती हैं, कान सुनते हैं, त्वचा स्पर्श करती है अथवा अन्य इन्द्रियाँ अनुभव करती हैं, वही वस्तुओं का वास्तविक स्वरूप है। यही विश्वास उसके निर्णयों, व्यवहार, विज्ञान, दर्शन और सम्पूर्ण सभ्यता का आधार बनता है। किन्तु यदि इस सामान्य धारणा का गम्भीर परीक्षण किया जाए तो अनेक ऐसे तथ्य सामने आते हैं जो बताते हैं कि मनुष्य जिस संसार का अनुभव करता है, वह वस्तुतः वास्तविकता का प्रत्यक्ष स्वरूप नहीं, बल्कि उसके मस्तिष्क द्वारा निर्मित एक व्याख्या है। हम जिस क्षण को वर्तमान समझते हैं, वह वास्तव में अतीत का एक सूक्ष्म अंश होता है। हमारी प्रत्येक अनुभूति में एक अपरिहार्य समय-अंतराल निहित रहता है। यही समय-अंतराल इस प्रश्न को जन्म देता है कि क्या हम कभी भी किसी वस्तु को ठीक उसी रूप में देख सकते हैं, जैसी वह वास्तव में उस क्षण विद्यमान है?
जब हम किसी वस्तु को देखते हैं, तब वास्तव में हम उस वस्तु से परावर्तित प्रकाश को देखते हैं। प्रकाश का वेग अत्यन्त अधिक है, फिर भी वह अनन्त नहीं है। अतः किसी भी वस्तु से निकलकर हमारी आँखों तक पहुँचने में उसे कुछ समय लगता है। यदि कोई व्यक्ति हमारे सामने एक मीटर की दूरी पर खड़ा है, तो भी उसका प्रकाश हमारी आँखों तक पहुँचने में कुछ नैनोसेकण्ड का समय लेता है। सूर्य का प्रकाश पृथ्वी तक पहुँचने में लगभग आठ मिनट का समय लेता है। अर्थात् हम सूर्य को कभी भी उसके वर्तमान रूप में नहीं देखते, बल्कि आठ मिनट पूर्व का स्वरूप देखते हैं। दूरस्थ तारों और आकाशगंगाओं के विषय में यह अंतर वर्षों, लाखों वर्षों अथवा अरबों वर्षों तक पहुँच जाता है। इस प्रकार सम्पूर्ण खगोलीय अवलोकन वस्तुतः इतिहास का अवलोकन है, वर्तमान का नहीं।
किन्तु वास्तविकता की यह दूरी केवल प्रकाश की गति तक सीमित नहीं है। जब प्रकाश हमारी आँखों तक पहुँच जाता है, तब भी देखने की प्रक्रिया पूर्ण नहीं होती। आँख की रेटिना उस प्रकाश को विद्युत संकेतों में परिवर्तित करती है। ये संकेत दृष्टि-तंत्रिका के माध्यम से मस्तिष्क तक पहुँचते हैं। वहाँ उनका विश्लेषण होता है, स्मृतियों से तुलना की जाती है, संदर्भ स्थापित किया जाता है और तब कहीं जाकर हमें किसी वस्तु का सचेत अनुभव होता है। इस सम्पूर्ण प्रक्रिया में भी समय लगता है। अर्थात् जिस क्षण हमें किसी वस्तु के दिखाई देने का अनुभव होता है, तब तक वह वस्तु पहले ही बदल चुकी होती है।
यदि संसार पूर्णतः स्थिर होता, तब यह विलम्ब बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं होता। परन्तु प्रकृति में स्थिरता नाम की कोई वस्तु नहीं है। ब्रह्माण्ड का प्रत्येक कण निरन्तर गति में है। पृथ्वी अपनी धुरी पर घूम रही है, सूर्य की परिक्रमा कर रही है। सूर्य स्वयं आकाशगंगा के केन्द्र की परिक्रमा कर रहा है। आकाशगंगा भी ब्रह्माण्ड में गतिशील है। सूक्ष्म स्तर पर अणु निरन्तर कम्पन करते रहते हैं। परमाणुओं के भीतर इलेक्ट्रॉन ऊर्जा अवस्थाओं में विद्यमान रहते हैं। ऊष्मा का अर्थ ही सूक्ष्म कणों की गति है। इस प्रकार जिस वस्तु को हम स्थिर समझते हैं, वह भी वास्तव में असंख्य गतियों का समन्वित परिणाम होती है।
यही नहीं, संसार का प्रत्येक कण अन्य कणों को किसी न किसी प्रकार प्रभावित भी करता है। गुरुत्वाकर्षण, विद्युतचुम्बकीय बल, नाभिकीय बल तथा अन्य प्राकृतिक नियम सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को एक-दूसरे से जोड़ते हैं। किसी एक स्थान पर होने वाला परिवर्तन प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से सम्पूर्ण व्यवस्था को प्रभावित करता है। इसलिए वास्तविकता कभी स्थिर चित्र नहीं होती; वह निरन्तर परिवर्तनशील प्रक्रिया होती है।
जब हमारी इन्द्रियाँ इस निरन्तर बदलती हुई वास्तविकता से सूचना ग्रहण करती हैं, तब तक वह वास्तविकता पहले ही परिवर्तित हो चुकी होती है। उसके बाद मस्तिष्क उस सूचना का विश्लेषण करता है। इस विश्लेषण में भी समय व्यतीत होता है। इसलिए हमारी चेतना जिस संसार का अनुभव करती है, वह वस्तुतः निरन्तर परिवर्तित हो चुके संसार का मानसिक पुनर्निर्माण होता है।
मस्तिष्क केवल सूचना प्राप्त नहीं करता, बल्कि उसका अर्थ भी निर्धारित करता है। यदि देखने की प्रक्रिया केवल आँखों का कार्य होती, तो सभी मनुष्य प्रत्येक वस्तु को समान रूप से देखते। किन्तु ऐसा नहीं होता। एक ही दृश्य को अनेक व्यक्ति भिन्न-भिन्न प्रकार से समझते हैं। इसका कारण यह है कि देखने का कार्य केवल आँख नहीं करती; मस्तिष्क भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। स्मृति, अनुभव, संस्कार, भाषा, अपेक्षाएँ और भावनाएँ हमारी अनुभूति को निरन्तर प्रभावित करती रहती हैं। इसलिए मनुष्य वस्तुओं को जैसा वे हैं, वैसा नहीं, बल्कि जैसा उसका मस्तिष्क उनका अर्थ निर्मित करता है, वैसा अनुभव करता है।
यही कारण है कि दृष्टिभ्रम उत्पन्न होते हैं। सीधी रेखाएँ टेढ़ी प्रतीत होती हैं, स्थिर चित्र गतिशील दिखाई देते हैं, समान रंग भिन्न दिखाई देते हैं। यदि हमारी दृष्टि पूर्णतः वस्तुनिष्ठ होती, तो ऐसे भ्रम कभी उत्पन्न न होते। दृष्टिभ्रम यह सिद्ध करते हैं कि अनुभव वास्तविकता की प्रतिलिपि नहीं, बल्कि उसकी व्याख्या है।
आधुनिक तंत्रिका-विज्ञान बताता है कि मस्तिष्क केवल अतीत का विश्लेषण नहीं करता, बल्कि भविष्य का अनुमान भी लगाता है। यदि ऐसा न हो तो मनुष्य किसी चलती हुई वस्तु को पकड़ ही नहीं सकता। क्रिकेट का बल्लेबाज़ गेंद को वहाँ नहीं मारता जहाँ वह दिखाई देती है; वह वहाँ प्रहार करता है जहाँ मस्तिष्क अनुमान लगाता है कि गेंद अगले क्षण होगी। वाहन चलाते समय भी चालक केवल वर्तमान दृश्य पर निर्भर नहीं रहता; उसका मस्तिष्क आगामी स्थिति का निरन्तर अनुमान लगाता रहता है। इसका अर्थ यह है कि हमारा अनुभव आधा वास्तविक सूचना पर आधारित होता है और आधा मस्तिष्क की भविष्यवाणी पर।
यह तथ्य दर्शन के क्षेत्र में भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। भारतीय दर्शन ने हजारों वर्ष पूर्व ही कहा था कि इन्द्रियाँ ज्ञान का साधन अवश्य हैं, किन्तु वे अंतिम प्रमाण नहीं हैं। उपनिषदों ने बाह्य जगत् को परिवर्तनशील बताया। अद्वैत वेदान्त ने प्रत्यक्ष संसार को व्यवहारिक सत्य माना, परन्तु अंतिम सत्य नहीं। बौद्ध दर्शन ने प्रत्येक वस्तु को क्षणभंगुर बताया। न्याय दर्शन ने प्रत्यक्ष ज्ञान को स्वीकार किया, किन्तु उसके साथ अनुमान और तर्क की आवश्यकता भी बताई। इन सभी परम्पराओं का संकेत यही था कि इन्द्रियों से प्राप्त ज्ञान उपयोगी तो है, परन्तु पूर्ण नहीं।
पाश्चात्य दर्शन में भी यही विचार विकसित हुआ। इमानुएल कांट ने कहा कि मनुष्य वस्तुओं को उनके अपने स्वरूप में नहीं जान सकता; वह केवल उन्हें वैसे जानता है जैसे वे उसकी अनुभूति की संरचना में प्रकट होती हैं। आधुनिक विज्ञान ने विभिन्न प्रयोगों द्वारा इस विचार को नया आधार प्रदान किया।
आइंस्टीन के सापेक्षता सिद्धान्त ने इस समस्या को और गहरा कर दिया। पहले यह माना जाता था कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में एक समान वर्तमान क्षण विद्यमान है। किन्तु सापेक्षता सिद्धान्त ने स्पष्ट किया कि समकालिकता स्वयं सापेक्ष है। जो घटनाएँ एक पर्यवेक्षक को एक साथ घटित होती हुई प्रतीत होती हैं, वे दूसरे पर्यवेक्षक के लिए अलग-अलग समय पर घटित हो सकती हैं। अर्थात् सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के लिए कोई एक सार्वभौमिक “वर्तमान” अस्तित्व में नहीं है। यदि ऐसा है, तो हमारा वर्तमान भी वस्तुतः हमारे सन्दर्भ-तन्त्र का परिणाम है।
क्वांटम भौतिकी ने भी यह संकेत दिया कि सूक्ष्म जगत हमारी सामान्य कल्पना से कहीं अधिक जटिल है। वहाँ निश्चितता के स्थान पर सम्भावना का शासन है। सूक्ष्म स्तर पर प्रकृति का व्यवहार हमारी सामान्य इन्द्रियानुभूति से मेल नहीं खाता। इसका अर्थ यह नहीं कि वास्तविकता अस्तित्वहीन है, बल्कि यह कि वास्तविकता हमारी सामान्य अनुभूति से कहीं अधिक गहन और जटिल है।
इन तथ्यों का अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य कभी सत्य को जान ही नहीं सकता। यदि ऐसा होता, तो विज्ञान का विकास असम्भव होता। विज्ञान की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि वह इन्द्रियों की सीमाओं को उपकरणों और तर्क के माध्यम से विस्तृत करता है। दूरबीन हमारी आँखों से अधिक दूर तक देखती है। सूक्ष्मदर्शी हमारी दृष्टि को सूक्ष्म संसार तक पहुँचाता है। रेडियो दूरबीन, गुरुत्वीय तरंगों के डिटेक्टर, कण-त्वरक और परमाणु घड़ियाँ हमारी प्राकृतिक सीमाओं को निरन्तर विस्तृत करते रहते हैं। विज्ञान इस तथ्य को स्वीकार करता है कि मनुष्य की प्रत्यक्ष अनुभूति सीमित है; इसलिए वह मापन, पुनरावृत्ति और गणित का सहारा लेता है।
वास्तव में ज्ञान की यात्रा इन्द्रियों से आरम्भ होती है, किन्तु वहीं समाप्त नहीं होती। प्रत्यक्ष अनुभव केवल प्रथम चरण है। उसके बाद तर्क, परीक्षण, तुलना, संशोधन और पुनः परीक्षण का क्रम चलता है। इसी प्रक्रिया से विज्ञान अधिक विश्वसनीय निष्कर्षों तक पहुँचता है। अतः इन्द्रियों की सीमा ज्ञान की समाप्ति नहीं, बल्कि ज्ञान की आवश्यकता का प्रारम्भ है।
इस समस्त चर्चा का एक गहरा नैतिक पक्ष भी है। यदि हमारी अनुभूति पूर्ण नहीं है, तो हमारे निर्णय भी पूर्ण नहीं हो सकते। इसलिए बौद्धिक विनम्रता प्रत्येक विचारशील व्यक्ति का गुण होना चाहिए। जो व्यक्ति यह मान लेता है कि वही अंतिम सत्य जानता है, वह विज्ञान और दर्शन दोनों की मूल भावना के विरुद्ध चलता है। सत्य की खोज का अर्थ है निरन्तर संशोधन के लिए तैयार रहना।
मानव सभ्यता का विकास इसी विनम्रता का परिणाम है। यदि प्रत्येक पीढ़ी अपने ज्ञान को अंतिम मान लेती, तो न नया विज्ञान विकसित होता, न नई खोजें होतीं और न ही दर्शन आगे बढ़ता। प्रत्येक नई खोज यह बताती है कि हमारी पूर्व धारणाएँ आंशिक थीं। इसी प्रकार भविष्य की खोजें भी हमारे वर्तमान ज्ञान को और अधिक परिष्कृत करेंगी।
अन्ततः यह कहा जा सकता है कि मनुष्य जिस संसार को देखता है, वह वास्तविकता का प्रत्यक्ष वर्तमान नहीं, बल्कि उसके अतीत का एक परिष्कृत मानसिक चित्र है। प्रकाश के आगमन में समय लगता है, तंत्रिका-संकेतों के संचरण में समय लगता है, मस्तिष्क को उनका अर्थ समझने में समय लगता है और इस सम्पूर्ण अवधि में संसार निरन्तर बदलता रहता है। प्रत्येक कण गति में है, प्रत्येक वस्तु परिवर्तनशील है और प्रत्येक परिवर्तन अन्य परिवर्तनों से जुड़ा हुआ है। इसलिए पूर्णतः तात्कालिक और शत-प्रतिशत यथार्थ प्रत्यक्ष अनुभव मनुष्य के लिए सम्भव नहीं है।
किन्तु यही सीमा मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति भी बन जाती है। क्योंकि जब उसे अपनी सीमाओं का बोध होता है, तभी वह विज्ञान का निर्माण करता है, दर्शन की रचना करता है, गणित विकसित करता है और सत्य की ओर आगे बढ़ता है। वास्तविकता को पूर्णतः पकड़ लेना शायद कभी सम्भव न हो, परन्तु उसके अधिकाधिक निकट पहुँचना अवश्य सम्भव है। यही वैज्ञानिक दृष्टि है, यही दार्शनिक विनम्रता है और यही मानव बुद्धि की सबसे बड़ी उपलब्धि भी।
यदि हम इस तथ्य को स्वीकार कर लें कि प्रत्येक अनुभूति में समय का एक अनिवार्य अंतराल निहित है, तो हमारे सामने एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण प्रश्न उपस्थित होता है—क्या मनुष्य कभी भी वर्तमान में जीता है? सामान्यतः हम कहते हैं कि हमें वर्तमान में जीना चाहिए, वर्तमान का आनंद लेना चाहिए अथवा वर्तमान में निर्णय लेना चाहिए। किन्तु वैज्ञानिक दृष्टि से विचार करें तो जिस क्षण को हम वर्तमान कहते हैं, वह हमारे लिए पहले ही अतीत बन चुका होता है। हमारी चेतना सदैव उस संसार का अनुभव करती है जो कुछ क्षण पहले अस्तित्व में था। यह अंतराल अत्यन्त सूक्ष्म अवश्य है, किन्तु उसका अस्तित्व असंदिग्ध है। इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि मनुष्य वर्तमान का नहीं, बल्कि अत्यन्त निकटवर्ती अतीत का अनुभव करता है और उसी के आधार पर भविष्य के लिए निर्णय लेता है।
यहीं से मस्तिष्क की अद्भुत क्षमता का परिचय मिलता है। यदि चेतना केवल अतीत को ही देखती रहती, तो मनुष्य का जीवन असम्भव हो जाता। वह किसी गतिशील वस्तु को पकड़ नहीं सकता, किसी वाहन को सुरक्षित नहीं चला सकता और न ही किसी संकट से स्वयं को बचा सकता। प्रकृति ने इस समस्या का समाधान मस्तिष्क को एक भविष्यवक्ता बनाकर किया है। मस्तिष्क केवल सूचना ग्रहण नहीं करता, वह प्रत्येक क्षण संभावनाओं का अनुमान भी लगाता रहता है। यही कारण है कि हम किसी व्यक्ति के चेहरे के भाव देखकर उसके अगले वाक्य का अनुमान लगा लेते हैं, किसी खिलाड़ी की शारीरिक मुद्रा देखकर उसके अगले कदम का आभास कर लेते हैं और किसी परिचित मार्ग पर चलते हुए बिना अधिक विचार किए सही दिशा में बढ़ते चले जाते हैं। हमारा जीवन वस्तुतः स्मृति और भविष्यवाणी के संयुक्त संचालन पर आधारित है।
यह तथ्य स्वतंत्र इच्छा के प्रश्न को भी एक नई दिशा देता है। हम प्रायः मानते हैं कि पहले हम सोचते हैं और उसके बाद कार्य करते हैं। किन्तु आधुनिक तंत्रिका-विज्ञान के अनेक प्रयोग संकेत करते हैं कि मस्तिष्क में निर्णय की प्रक्रिया हमारी सचेत अनुभूति से पहले आरम्भ हो जाती है। जब हमें यह अनुभव होता है कि हमने कोई निर्णय लिया है, तब तक उस निर्णय की जैविक प्रक्रिया पहले ही प्रारम्भ हो चुकी होती है। इसका अर्थ यह नहीं कि मनुष्य एक यांत्रिक मशीन है, बल्कि यह कि चेतना स्वयं भी प्रकृति की एक जटिल प्रक्रिया का भाग है। हमारी अनुभूति घटनाओं का अंतिम चरण है, उनका प्रारम्भिक कारण नहीं।
यदि ऐसा है, तो हमें ज्ञान की प्रकृति पर भी पुनर्विचार करना होगा। हम किसी वस्तु को देखकर यह विश्वास कर लेते हैं कि हमने उसे जान लिया। किन्तु वास्तव में हमने केवल उसके विषय में उपलब्ध सीमित संकेतों का अर्थ निकाला है। ज्ञान वस्तु का नहीं, बल्कि वस्तु के साथ हमारे संबंध का परिणाम है। जिस प्रकार एक ही पर्वत विभिन्न दिशाओं से अलग-अलग दिखाई देता है, उसी प्रकार वास्तविकता भी प्रत्येक पर्यवेक्षक के लिए उसकी स्थिति, साधनों और बौद्धिक क्षमता के अनुसार भिन्न रूप में प्रकट होती है। इसलिए ज्ञान सदैव संदर्भ-सापेक्ष होता है, यद्यपि इसका अर्थ यह नहीं कि सत्य का अस्तित्व ही नहीं है। सत्य एक हो सकता है, किन्तु उसकी ओर जाने वाले मार्ग अनेक हो सकते हैं।
भारतीय दर्शन में ‘नेति-नेति’ का सिद्धान्त इसी बौद्धिक विनम्रता की अभिव्यक्ति है। इसका अर्थ यह नहीं कि सत्य का निषेध किया जा रहा है, बल्कि यह कि जो कुछ हम जान रहे हैं, वह अंतिम नहीं है। प्रत्येक नई समझ हमें यह बताती है कि वास्तविकता उससे भी अधिक व्यापक है। विज्ञान भी वस्तुतः इसी पद्धति का अनुसरण करता है। वह किसी सिद्धान्त को अंतिम सत्य घोषित नहीं करता। प्रत्येक सिद्धान्त तब तक मान्य रहता है, जब तक कोई अधिक व्यापक सिद्धान्त उसे संशोधित या विस्तृत न कर दे। न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त असत्य नहीं था; आइंस्टीन ने उसकी सीमा स्पष्ट की। भविष्य में आइंस्टीन के सिद्धान्तों का भी और व्यापक परिष्कार सम्भव है। यही विज्ञान की शक्ति है और यही उसकी विनम्रता।
यदि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड निरन्तर परिवर्तनशील है, तो स्थायित्व का अनुभव कहाँ से आता है? इसका उत्तर भी मस्तिष्क की कार्यप्रणाली में निहित है। हमारा मस्तिष्क असंख्य परिवर्तनों के बीच कुछ स्थायी प्रतिरूप खोजता है। वही प्रतिरूप हमारे लिए ‘वस्तु’ बन जाते हैं। वास्तव में नदी का जल प्रत्येक क्षण बदलता रहता है, किन्तु हम उसे एक ही नदी कहते हैं। शरीर की अधिकांश कोशिकाएँ समय-समय पर बदल जाती हैं, फिर भी हम स्वयं को वही व्यक्ति मानते हैं। समाज बदलता है, भाषा बदलती है, विचार बदलते हैं, किन्तु हम उनमें निरन्तरता का अनुभव करते हैं। इसका कारण यह है कि मस्तिष्क परिवर्तन के बीच व्यवस्था खोजने के लिए विकसित हुआ है। यदि वह ऐसा न करे, तो संसार हमारे लिए अर्थहीन घटनाओं की एक अव्यवस्थित श्रृंखला बन जाएगा।
इसी संदर्भ में कारण और परिणाम के संबंध को भी समझना आवश्यक है। किसी भी घटना का प्रभाव तत्काल समाप्त नहीं हो जाता। प्रत्येक घटना अपने पीछे नई घटनाओं की श्रृंखला छोड़ जाती है। एक विचार दूसरे विचार को जन्म देता है, एक शब्द अनेक प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करता है और एक छोटा-सा निर्णय कभी-कभी इतिहास की दिशा बदल देता है। यदि ब्रह्माण्ड का प्रत्येक कण अन्य कणों को प्रभावित करता है, तो मनुष्य के प्रत्येक कर्म का प्रभाव भी उससे कहीं अधिक व्यापक हो सकता है जितना वह तत्काल देख पाता है। इसलिए किसी भी निर्णय का मूल्यांकन केवल उसके तात्कालिक परिणामों से नहीं किया जा सकता।
यही दृष्टिकोण हमें नैतिकता के एक गहरे आधार तक भी पहुँचाता है। यदि हम स्वीकार करते हैं कि हम वास्तविकता का केवल आंशिक अनुभव करते हैं, तो हमें अपने मत, अपने विश्वास और अपने निर्णय दूसरों पर अंतिम सत्य के रूप में आरोपित करने से बचना चाहिए। संवाद, परीक्षण, आत्मालोचन और संशोधन किसी भी सभ्य समाज के अनिवार्य गुण हैं। कट्टरता वहीं जन्म लेती है जहाँ मनुष्य अपनी सीमित अनुभूति को असीम सत्य मान बैठता है। इसके विपरीत, वैज्ञानिक दृष्टि और दार्शनिक विवेक दोनों हमें यह सिखाते हैं कि सत्य की खोज एक सतत यात्रा है, कोई अंतिम पड़ाव नहीं।
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यदि हम इस विचार को और आगे बढ़ाएँ तो स्पष्ट होता है कि समय केवल घड़ी की सुइयों का नाम नहीं है। समय वस्तुतः परिवर्तन का दूसरा नाम है। जहाँ परिवर्तन नहीं है, वहाँ समय का कोई अर्थ नहीं रह जाता। यदि ब्रह्माण्ड का प्रत्येक कण निरन्तर गति में है और प्रत्येक क्षण अपनी पूर्ववर्ती अवस्था से भिन्न है, तो यह स्वीकार करना होगा कि वास्तविकता किसी स्थिर चित्र की भाँति नहीं, बल्कि एक सतत प्रवाहित होने वाली प्रक्रिया है। मनुष्य की सबसे बड़ी भूल यह है कि वह इस प्रवाह को स्थिर वस्तुओं में विभाजित करके देखता है। वह पर्वत को स्थिर मानता है, जबकि भूगर्भीय समय में वह भी निरन्तर बदल रहा है। वह अपने शरीर को स्थायी समझता है, जबकि उसके भीतर प्रत्येक क्षण करोड़ों कोशिकाएँ जन्म लेती हैं और नष्ट होती रहती हैं। वह समाज को स्थिर व्यवस्था मानता है, जबकि प्रत्येक पीढ़ी उसके विचारों, मूल्यों और संरचनाओं को परिवर्तित करती रहती है।
ऊष्मागतिकी का दूसरा नियम, जिसे एंट्रॉपी का नियम कहा जाता है, भी इसी सत्य की ओर संकेत करता है। प्रत्येक प्राकृतिक व्यवस्था समय के साथ परिवर्तन की दिशा में अग्रसर होती है। ऊर्जा के वितरण की प्रवृत्ति, संरचनाओं का बनना और बिगड़ना तथा पदार्थ का निरन्तर पुनर्गठन यह सिद्ध करता है कि ब्रह्माण्ड किसी जड़ चित्र का नहीं, बल्कि गतिशील विकास का नाम है। यदि ऐसा है, तो हमारे द्वारा देखा गया प्रत्येक दृश्य अगले ही क्षण भिन्न हो चुका होता है। हम चाहे किसी पर्वत को देखें, किसी वृक्ष को देखें या अपने प्रिय व्यक्ति के चेहरे को देखें, हम वास्तव में उस क्षण का नहीं, बल्कि उस क्षण से थोड़ा पूर्व के अस्तित्व का अनुभव कर रहे होते हैं।
भारतीय दर्शन में ‘क्षणिकवाद’ का सिद्धान्त इसी तथ्य की दार्शनिक अभिव्यक्ति है। बौद्ध आचार्यों ने कहा कि संसार की प्रत्येक वस्तु प्रत्येक क्षण उत्पन्न होती है, उसी क्षण नष्ट होती है और अगले क्षण एक नवीन अवस्था धारण कर लेती है। यदि यह दृष्टिकोण आधुनिक भौतिकी के आलोक में देखा जाए तो आश्चर्यजनक साम्य दिखाई देता है। परमाणुओं और उपपरमाण्विक कणों की गतिशीलता, ऊर्जा का निरन्तर आदान-प्रदान तथा प्रकृति का परिवर्तनशील स्वरूप यह बताता है कि स्थायित्व मुख्यतः हमारी अनुभूति की सुविधा के लिए निर्मित एक मानसिक अवधारणा है।
अद्वैत वेदान्त इस चर्चा को एक और गहराई प्रदान करता है। उसके अनुसार परिवर्तनशील जगत् व्यवहार की दृष्टि से सत्य है, किन्तु परम सत्य नहीं। इसका अभिप्राय यह नहीं कि संसार का अस्तित्व नहीं है; बल्कि यह कि इन्द्रियों द्वारा अनुभव किया गया संसार अंतिम वास्तविकता नहीं है। मनुष्य का अनुभव सीमित है, इसलिए उसका सत्य भी सीमित है। जैसे समुद्र की केवल सतह देखकर उसकी सम्पूर्ण गहराई का अनुमान नहीं लगाया जा सकता, वैसे ही इन्द्रियों से प्राप्त ज्ञान को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता।
आधुनिक विज्ञान भी अप्रत्यक्ष रूप से इसी निष्कर्ष तक पहुँचता दिखाई देता है। हम प्रकाश के दृश्य भाग को ही देख सकते हैं, जबकि विद्युतचुम्बकीय वर्णक्रम का अधिकांश भाग हमारी आँखों से अदृश्य है। हम ध्वनि की सीमित आवृत्तियाँ ही सुन सकते हैं। हमारी घ्राण, स्पर्श और स्वाद की क्षमताएँ भी सीमित हैं। यदि हमारी इन्द्रियाँ सीमित हैं, तो उनसे निर्मित विश्व का अनुभव भी सीमित होगा। इसका अर्थ यह नहीं कि अदृश्य वस्तुएँ अस्तित्वहीन हैं; बल्कि यह कि हमारा ज्ञान हमारे उपकरणों और हमारी चेतना की क्षमता पर निर्भर है।
यहीं से एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण दार्शनिक निष्कर्ष निकलता है। मनुष्य संसार को जैसा है, वैसा नहीं देखता; वह संसार को वैसा देखता है जैसा उसकी इन्द्रियाँ और उसका मस्तिष्क उसे देखने की अनुमति देते हैं। दूसरे शब्दों में, मनुष्य का अनुभव वस्तु और चेतना के बीच होने वाले संवाद का परिणाम है। वस्तु अकेले अनुभव नहीं बनती और चेतना अकेले संसार की रचना नहीं करती; दोनों के पारस्परिक सम्बन्ध से अनुभव जन्म लेता है। इसलिए प्रत्येक अनुभव आंशिक भी है और संदर्भ-निर्भर भी।
यह विचार सामाजिक जीवन में भी उतना ही सत्य है। किसी घटना के अनेक प्रत्यक्षदर्शी अलग-अलग विवरण प्रस्तुत करते हैं। न्यायालयों में गवाहों के कथनों में अंतर पाया जाता है। इतिहासकार एक ही घटना की भिन्न व्याख्या करते हैं। राजनीतिक विचारधाराएँ समान तथ्यों से भिन्न निष्कर्ष निकालती हैं। इसका कारण केवल पक्षपात नहीं होता; उसका एक कारण यह भी है कि प्रत्येक व्यक्ति की अनुभूति उसकी स्मृतियों, अनुभवों, संस्कारों, भाषा, भावनाओं और अपेक्षाओं से निर्मित होती है। इसलिए सत्य तक पहुँचने का मार्ग केवल प्रत्यक्ष अनुभव नहीं, बल्कि संवाद, परीक्षण, तर्क और निरन्तर आत्मसमीक्षा भी है।
यही कारण है कि वैज्ञानिक पद्धति मानव सभ्यता की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक मानी जाती है। विज्ञान यह मानकर चलता है कि व्यक्तिगत अनुभव त्रुटिपूर्ण हो सकता है। इसलिए वह प्रयोगों की पुनरावृत्ति करता है, स्वतंत्र परीक्षण कराता है, गणितीय विश्लेषण का सहारा लेता है और किसी भी निष्कर्ष को संशोधन के लिए सदैव खुला रखता है। विज्ञान की महानता उसके निष्कर्षों में नहीं, बल्कि उसकी आत्मसुधार की क्षमता में है। जो सभ्यता अपनी धारणाओं की समीक्षा करना छोड़ देती है, उसका बौद्धिक विकास भी रुक जाता है।
यदि हम यह स्वीकार कर लें कि हमारी प्रत्येक अनुभूति अपूर्ण है, तो अहंकार स्वतः कम होने लगेगा। हम अपने विचारों को अंतिम सत्य मानने के स्थान पर उन्हें सत्य की खोज की एक अवस्था मानेंगे। असहमति हमें शत्रुता नहीं लगेगी, बल्कि ज्ञान-विस्तार का अवसर प्रतीत होगी। यही वैज्ञानिक दृष्टिकोण है और यही दार्शनिक परिपक्वता भी।
मानव इतिहास में अधिकांश संघर्ष इस विश्वास से उत्पन्न हुए हैं कि ‘जो मैं देख रहा हूँ, वही सम्पूर्ण सत्य है।’ यदि व्यक्ति, समाज और राष्ट्र यह समझ लें कि प्रत्येक दृष्टिकोण वास्तविकता का केवल एक अंश प्रस्तुत करता है, तो संवाद की संस्कृति विकसित होगी, मतभेद संघर्ष में नहीं बदलेंगे और ज्ञान की यात्रा अधिक रचनात्मक बनेगी। विनम्रता केवल नैतिक गुण नहीं, बल्कि ज्ञान प्राप्ति की अनिवार्य शर्त है।
मनुष्य का समस्त अनुभव एक अद्भुत विरोधाभास पर आधारित है। वह ऐसे वर्तमान का अनुभव करता है जो उसके लिए पहले ही अतीत बन चुका होता है। वह ऐसे स्थायित्व को देखता है जो वास्तव में निरन्तर परिवर्तन है। वह ऐसे संसार को प्रत्यक्ष मानता है जो उसकी इन्द्रियों, तंत्रिका-तंत्र और मस्तिष्क द्वारा निर्मित व्याख्या का परिणाम है। फिर भी यही मनुष्य अपनी सीमाओं को पहचानकर दूरबीन बनाता है, सूक्ष्मदर्शी बनाता है, गणित रचता है, दर्शन का सृजन करता है और ब्रह्माण्ड के रहस्यों को समझने का साहस करता है।
यही मानव बुद्धि का वास्तविक वैभव है। पूर्ण सत्य का दावा करना बुद्धिमत्ता नहीं, बल्कि अज्ञान का संकेत है; जबकि अपनी सीमाओं को स्वीकार करते हुए सत्य की ओर निरन्तर अग्रसर रहना ही ज्ञान का सर्वोच्च रूप है। सम्भव है कि हम कभी भी वास्तविकता को उसके सम्पूर्ण स्वरूप में न देख सकें, क्योंकि देखने की प्रत्येक प्रक्रिया समय से बँधी है, परिवर्तन से प्रभावित है और चेतना की सीमाओं में घटित होती है। किन्तु यह भी उतना ही सत्य है कि प्रत्येक नई खोज, प्रत्येक नया तर्क और प्रत्येक नया अनुभव हमें उस अनन्त सत्य के कुछ और निकट अवश्य ले जाता है।
इसलिए मनुष्य का लक्ष्य यह नहीं होना चाहिए कि वह यह दावा करे कि उसने सत्य को पूर्णतः प्राप्त कर लिया है; उसका लक्ष्य यह होना चाहिए कि वह अपने प्रत्येक ज्ञान को परीक्षण की कसौटी पर रखे, अपनी प्रत्येक धारणा को संशोधन के लिए खुला रखे और अपनी प्रत्येक अनुभूति के पीछे छिपी सीमाओं को समझते हुए निरन्तर सीखता रहे। यही वैज्ञानिक चेतना है, यही दार्शनिक विवेक है और यही वह मार्ग है जो मनुष्य को अज्ञान के अहंकार से निकालकर ज्ञान की विनम्रता तक पहुँचाता है। सम्भवतः यही वह बिंदु है जहाँ विज्ञान और दर्शन परस्पर विरोधी नहीं रहते, बल्कि एक ही सत्य की ओर बढ़ने वाले दो पूरक पथ बन जाते हैं।
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अब प्रश्न यह उठता है कि यदि मनुष्य वास्तविकता को उसके वर्तमान स्वरूप में कभी नहीं देख सकता, तो क्या कारण-कार्य सम्बन्ध भी हमारे अनुभव से भिन्न होता है? उत्तर निस्सन्देह हाँ है। हम प्रायः यह मान लेते हैं कि हमने किसी घटना को घटित होते हुए देखा और उसी क्षण उसका प्रभाव भी समझ लिया। किन्तु वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है। प्रत्येक कारण अपने प्रभाव को समय के माध्यम से व्यक्त करता है और प्रत्येक प्रभाव स्वयं आगे चलकर अनेक नए कारणों का निर्माण करता है। इसलिए ब्रह्माण्ड में कोई भी घटना पृथक् नहीं होती। प्रत्येक घटना अनगिनत पूर्ववर्ती घटनाओं की उत्तराधिकारी होती है और असंख्य भविष्य की घटनाओं की जननी भी।
यदि किसी तालाब में एक छोटा-सा पत्थर फेंका जाए, तो उसकी तरंगें दूर तक फैलती चली जाती हैं। कुछ समय बाद तरंगें दिखाई देना बन्द हो जाती हैं, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि उनका प्रभाव समाप्त हो गया। उसी प्रकार मनुष्य का प्रत्येक विचार, प्रत्येक शब्द और प्रत्येक कर्म समाज, प्रकृति तथा आने वाली पीढ़ियों तक किसी-न-किसी रूप में पहुँचता है। चूँकि हम सम्पूर्ण कारण-श्रृंखला को नहीं देख पाते, इसलिए हम अनेक बार घटनाओं का आंशिक मूल्यांकन कर बैठते हैं। यही कारण है कि किसी नीति का परिणाम वर्षों बाद सामने आता है, किसी वैज्ञानिक खोज का प्रभाव शताब्दियों तक बना रहता है और किसी दार्शनिक विचार की प्रतिध्वनि अनेक युगों तक सुनाई देती है।
इस संदर्भ में स्मृति की भूमिका भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। हमारी चेतना केवल वर्तमान संकेतों से निर्मित नहीं होती; उसमें अतीत की स्मृतियाँ निरन्तर सक्रिय रहती हैं। वास्तव में मनुष्य जो देखता है, उसमें आधा भाग वर्तमान से आता है और आधा भाग स्मृति से। जब हम किसी परिचित व्यक्ति को देखते हैं, तो केवल उसका चेहरा नहीं देखते; उसके साथ जुड़े हुए वर्षों के अनुभव, भावनाएँ और सम्बन्ध भी उसी क्षण सक्रिय हो जाते हैं। इस प्रकार हमारा अनुभव केवल बाहरी संसार का नहीं, बल्कि हमारे अन्तर्जगत् का भी प्रतिबिम्ब होता है। इसलिए दो व्यक्तियों द्वारा देखी गई एक ही घटना अलग-अलग अर्थ ग्रहण कर सकती है।
इसी प्रकार भविष्य की कल्पना भी हमारे अनुभव को प्रभावित करती है। भय, आशा, अपेक्षा और कल्पना वर्तमान अनुभूति को बदल देते हैं। जो व्यक्ति भयभीत है, उसे साधारण ध्वनि भी संकट प्रतीत हो सकती है; जो आशावादी है, वही परिस्थिति उसे अवसर दिखाई दे सकती है। इसका अर्थ यह है कि मनुष्य न केवल अतीत के प्रभाव में जीता है, बल्कि भविष्य की सम्भावनाओं से भी संचालित होता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो चेतना अतीत, वर्तमान और भविष्य का एक सतत संवाद है।
यहीं पर समय की हमारी सामान्य अवधारणा भी चुनौती के सामने खड़ी हो जाती है। हम समय को एक सीधी रेखा मानते हैं—अतीत पीछे है, वर्तमान बीच में है और भविष्य आगे है। किन्तु हमारी चेतना में ये तीनों सदैव साथ-साथ उपस्थित रहते हैं। स्मृति अतीत को वर्तमान में ले आती है, अनुभूति वर्तमान का निर्माण करती है और कल्पना भविष्य को वर्तमान का भाग बना देती है। इसलिए मनुष्य का मानसिक संसार घड़ी के समय से कहीं अधिक जटिल है।
यदि हम सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को इस दृष्टि से देखें, तो स्पष्ट होता है कि वास्तविकता कोई जड़ वस्तु नहीं, बल्कि सम्बन्धों का एक विशाल तन्त्र है। प्रत्येक कण अन्य कणों से जुड़ा है, प्रत्येक ऊर्जा अन्य ऊर्जा से सम्बद्ध है और प्रत्येक परिवर्तन सम्पूर्ण व्यवस्था में सूक्ष्म प्रभाव उत्पन्न करता है। इसीलिए प्रकृति में पूर्ण पृथकता का कोई अस्तित्व नहीं है। मनुष्य स्वयं भी इस महान् व्यवस्था का एक अंग है, उससे बाहर खड़ा हुआ दर्शक नहीं।
यही समझ हमें पर्यावरण, समाज और नैतिकता के प्रति भी अधिक उत्तरदायी बनाती है। यदि हमारा प्रत्येक कर्म व्यापक व्यवस्था को प्रभावित करता है, तो कोई भी कार्य पूर्णतः निजी नहीं रह जाता। प्रकृति का दोहन, हिंसा, असत्य, अन्याय अथवा असीम उपभोग अन्ततः उसी व्यवस्था को क्षति पहुँचाते हैं जिसका हम स्वयं एक अभिन्न भाग हैं। इसके विपरीत, सत्य, सहयोग, करुणा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और विवेक केवल नैतिक आदर्श नहीं हैं; वे उस पारस्परिक सम्बन्ध की स्वाभाविक अभिव्यक्तियाँ हैं जो सम्पूर्ण अस्तित्व को एक सूत्र में बाँधता है।
ज्ञान का मार्ग दावे से नहीं, जिज्ञासा से प्रारम्भ होता है। जो व्यक्ति यह कहता है कि उसने सम्पूर्ण सत्य जान लिया है, वह वस्तुतः अपनी खोज समाप्त कर देता है। इसके विपरीत जो यह स्वीकार करता है कि उसका प्रत्येक ज्ञान सीमित है, वही आगे बढ़ने की सम्भावना बनाए रखता है। यही वैज्ञानिक अनुसंधान की आत्मा है, यही दार्शनिक चिन्तन का मूल है और यही आध्यात्मिक साधना का भी सार है।
संभव है कि मानव जाति कभी भी वास्तविकता को उसके सम्पूर्ण और अंतिम स्वरूप में न जान सके। फिर भी यह भी उतना ही सत्य है कि प्रत्येक पीढ़ी अपने पूर्वजों की अपेक्षा सत्य के कुछ और निकट पहुँच सकती है। यही प्रगति है, यही सभ्यता है और यही मानव चेतना की सबसे बड़ी विजय है। इसलिए हमें अपने ज्ञान पर गर्व अवश्य होना चाहिए, परन्तु उससे कहीं अधिक अपनी जिज्ञासा, अपनी विनम्रता और सत्य की अनवरत खोज पर गर्व होना चाहिए। यही वह दृष्टि है जो मनुष्य को अन्धविश्वास से विज्ञान की ओर, अहंकार से विवेक की ओर और सीमित अनुभूति से व्यापक सत्य की ओर ले जाती है।
– शेखर
