यारो, जीवन क्या होता है?
ग़ज़ल
यारो, जीवन क्या होता है?
कुछ का, सपनों-सा होता है।
बस उस पर ही प्यार उमड़ता,
जो लगता, अपना होता है।
सहज भाव जिसने भी छोड़ा,
वो जल्दी बूढ़ा होता है।
कहने में कुछ खर्च न होता,
करने में, करना होता है।
दुनिया कहती मज़हब जिसको
इक सँकरा पिंजरा होता है।
अहंकार-आलस जब हटते,
तब ही दिल हल्का होता है।
आशंकाएं दूर रखीं जब,
काम तभी अच्छा होता है।
जितनी जिससे आस बँधी, वो,
कम उससे थोड़ा होता है।
यार-दोस्त के रहते भी तो,
मन अक्सर तन्हा होता है।
– वीरेन्द्र कुमार शेखर
