निर्वाह कर सके न कभी तीरगी से हम
ग़ज़ल
निर्वाह कर सके न कभी तीरगी से हम,
कहते हैं शेर रोशनी के, हर किसी से हम।
बच्चों की मुस्कुराहटों पे जां निसार दें,
बढ़कर उसे तो मान रहे हर ख़ुशी से हम।
माने वो सिरफिरा कि गुनहगार, अब मुझे,
जायज़ सवाल करते रहे हर किसी से हम।
दुश्मन की क्या बिसात, कि वो वार कर सके,
डरते हैं कुछ इक दोस्तों की दोस्ती से हम।
इंसान ही बनाता रहा है धरा पे स्वर्ग,
ये काम कर रहें हैं, मगर सादगी से हम।
ज़िन्दा हो तो, ज़िन्दादिली, कुछ तो दिखाई दे,
लड़ते रहेंगे होश में अफ़सुर्दगी से हम।
जिसमें किसी के दर्द से तक़लीफ़ ख़ुद को हो,
यारो अभी भी दूर हैं उस बंदगी से हम।
लीकों पे चल सके न किसी के दवाब में,
ख़ुश हैं बहुत ही जह्न की आवारगी से हम।
अशआर रोशनी की कोई राह खोल दें,
है फ़र्ज़ ये, निभाते जिसे शायरी से हम।
तीरगी= अँधेरा, निसारना= न्योछावर कर देना, बिसात= सामर्थ्य, अफ़सुर्दगी= उदासीनता। लीक=पूर्व निर्धारित रास्ता, अशआर=शेर का बहुवचन।
-वीरेन्द्र कुमार शेखर
