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हमारे दुखों का कारण है अज्ञानता और ज्ञान वही है जो प्रमाणित हो

साहित्य का संसार कल्पना, प्रतीक, भाव और सौन्दर्य का संसार है। कवि और लेखक भविष्य की सम्भावनाओं को भी शब्द दे सकते हैं। वे ऐसे दृश्य रच सकते हैं जिन्हें विज्ञान कई शताब्दियों बाद साकार करे। किसी कथा में उड़ते हुए रथ, दूर से संवाद या अद्भुत उपकरणों का वर्णन होना साहित्यिक कल्पना भी हो सकता है, दार्शनिक प्रतीक भी और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति भी। केवल ऐसे वर्णन के आधार पर यह निष्कर्ष निकाल लेना कि आधुनिक अर्थों में वही तकनीक उस समय अस्तित्व में थी, बौद्धिक सावधानी के अनुकूल नहीं होगा। साहित्य प्रेरणा दे सकता है, संकेत दे सकता है, सम्भावना जगा सकता है, किन्तु वह अपने आप में तकनीकी या ऐतिहासिक प्रमाण नहीं बन जाता।साहित्य और वास्तविकता में भेद करना आवश्यक है।

यह भी सत्य है कि मानव कल्पना अनेक बार विज्ञान से पहले चलती है। अनेक लेखकों ने समुद्र के भीतर चलने वाले जहाजों की कल्पना उस समय की थी जब वास्तविक पनडुब्बियाँ अस्तित्व में नहीं थीं। कई रचनाकारों ने चन्द्रमा की यात्रा का चित्रण उस युग में किया जब मनुष्य पृथ्वी के वातावरण से बाहर भी नहीं निकला था। इससे यह सिद्ध नहीं होता कि उनके समय में वे तकनीकें वास्तव में विद्यमान थीं। यह केवल मानव बुद्धि की दूरदर्शिता का परिचायक है। कल्पना भविष्य का द्वार खोल सकती है, किन्तु वह इतिहास का प्रमाण नहीं बन जाती।

इसी प्रकार यदि कोई यह कहे कि आधुनिक टेलीविजन अथवा इंटरनेट जैसी तकनीक प्राचीन काल में विद्यमान थी, तो उस दावे की जाँच उसी वैज्ञानिक दृष्टि से की जानी चाहिए जिससे किसी अन्य ऐतिहासिक दावे की की जाती है। यदि वास्तव में ऐसी तकनीक अस्तित्व में थी, तो उसके साथ विद्युत उत्पादन की व्यवस्था, संचार प्रणाली, उपकरणों का निर्माण, तकनीकी संरचना, प्रयोग की पद्धति और उनके भौतिक प्रमाण भी मिलने चाहिए। केवल दूर से देखने या दूर तक सुनने के किसी वर्णन को आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक तकनीक का प्रमाण मान लेना उचित नहीं होगा।

हाँ, यदि किसी आधुनिक आविष्कार के वास्तविक निर्माण से बहुत पहले उपलब्ध साहित्य में उसकी संरचना, कार्यविधि, उपयोग, सीमाएँ और तकनीकी सिद्धान्तों का इतना स्पष्ट और विशिष्ट वर्णन मिलता है कि वह आधुनिक ज्ञान से मेल खाता हो, तब वह विषय निश्चय ही गम्भीर अनुसन्धान का अधिकारी बन जाता है। किन्तु तब भी केवल साहित्य पर्याप्त नहीं होगा; उसके समर्थन में स्वतंत्र ऐतिहासिक, पुरातात्त्विक और वैज्ञानिक प्रमाणों की आवश्यकता बनी रहेगी। ज्ञान की प्रतिष्ठा सम्भावनाओं पर नहीं, प्रमाणों पर होती है।

विज्ञान का सम्पूर्ण स्वरूप इसी विनम्रता पर आधारित है कि वह किसी निष्कर्ष को अन्तिम सत्य नहीं मानता। वह प्रत्येक दावे से पूछता है—क्या इसका परीक्षण सम्भव है? क्या इसे पुनः सिद्ध किया जा सकता है? क्या अन्य शोधकर्ता भी वही परिणाम प्राप्त करते हैं? यदि उत्तर सकारात्मक हो, तभी कोई सिद्धान्त स्वीकार किया जाता है। यही कारण है कि विज्ञान निरन्तर विकसित होता है। वह अपनी भूलों को स्वीकार करता है, नए प्रमाण मिलने पर स्वयं को संशोधित करता है और इसी कारण विश्वसनीय बना रहता है।

इतिहास भी इसी प्रकार कार्य करता है। इतिहासकार किसी एक कथा, एक परम्परा या एक ग्रन्थ के आधार पर निष्कर्ष नहीं निकालते। वे शिलालेखों, सिक्कों, पुरातात्त्विक उत्खननों, विदेशी यात्रियों के विवरणों, स्थानीय अभिलेखों, समकालीन साहित्य तथा वैज्ञानिक परीक्षणों का पारस्परिक मिलान करते हैं। जब विभिन्न स्रोत एक-दूसरे की पुष्टि करते हैं, तभी कोई ऐतिहासिक तथ्य स्थापित होता है। यदि ऐसा न किया जाए, तो इतिहास कल्पना और तथ्य का मिश्रण बनकर रह जाएगा।

किसी भी राष्ट्र का गौरव उसके सत्य में निहित होता है, अतिशयोक्ति में नहीं। जिन सभ्यताओं ने गणित, दर्शन, चिकित्सा, धातु विज्ञान, साहित्य और आध्यात्मिक चिन्तन में महान योगदान दिया है, उन्हें महान सिद्ध करने के लिए कल्पित उपलब्धियों का सहारा लेने की आवश्यकता नहीं होती। वास्तविक उपलब्धियाँ स्वयं प्रकाशमान होती हैं। असत्य अथवा अप्रमाणित दावे क्षणिक उत्साह तो उत्पन्न कर सकते हैं, परन्तु अन्ततः वे वास्तविक उपलब्धियों की विश्वसनीयता को भी क्षति पहुँचाते हैं। इसलिए राष्ट्रीय स्वाभिमान का आधार भी प्रमाण और सत्य ही होना चाहिए।

यहाँ यह समझना भी आवश्यक है कि आस्था और इतिहास के क्षेत्र अलग-अलग हैं। आस्था व्यक्ति को आध्यात्मिक बल प्रदान करती है, जबकि इतिहास और विज्ञान वस्तुनिष्ठ प्रमाणों के आधार पर निष्कर्ष निकालते हैं। किसी धार्मिक, सांस्कृतिक या दार्शनिक परम्परा का सम्मान करते हुए भी वैज्ञानिक तथ्यों की परीक्षा प्रमाणों से ही करनी होगी। दोनों का अपना-अपना महत्व है, किन्तु दोनों की कार्यप्रणाली भिन्न है।

संशय को अनेक बार नकारात्मक दृष्टि से देखा जाता है, जबकि वास्तव में वही ज्ञान की पहली सीढ़ी है। जो व्यक्ति प्रश्न नहीं करता, वह सत्य तक नहीं पहुँच सकता। प्रश्न करना सत्य का विरोध नहीं, बल्कि सत्य का सम्मान है। यदि कोई दावा वास्तविक है, तो प्रमाण उसे और अधिक सुदृढ़ बना देंगे। यदि प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, तो संशय स्वाभाविक और आवश्यक है। यही स्वस्थ बौद्धिक परम्परा का आधार है।

जितना बड़ा दावा होगा, उतने ही अधिक और मजबूत प्रमाण अपेक्षित होंगे। साधारण बातों के लिए साधारण प्रमाण पर्याप्त हो सकते हैं, किन्तु यदि दावा यह हो कि किसी प्राचीन युग में आधुनिक विज्ञान से भी अधिक विकसित तकनीकें विद्यमान थीं, तो उसके लिए असाधारण स्तर के वैज्ञानिक, ऐतिहासिक और पुरातात्त्विक साक्ष्य प्रस्तुत करने होंगे। असाधारण दावे कभी भी केवल विश्वास के आधार पर स्वीकार नहीं किए जा सकते।

मानव सभ्यता का भविष्य भी इसी बात पर निर्भर करता है कि वह प्रमाण, तर्क और सत्यनिष्ठा की इस परम्परा को बनाए रखे। यदि हम बिना प्रमाण के प्रत्येक दावे को स्वीकार करने लगेंगे, तो विज्ञान और अन्धविश्वास, इतिहास और कल्पना, तथ्य और मिथक के बीच का अन्तर धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगा। तब ज्ञान का वह प्रकाश, जिसने मानव को अज्ञान के अन्धकार से बाहर निकाला, स्वयं धूमिल पड़ जाएगा।

अन्ततः सत्य वही है जो प्रमाणों के साथ खड़ा रह सके। वह किसी भावना का विरोधी नहीं होता, किन्तु भावनाओं का बन्धक भी नहीं बनता। वह किसी राष्ट्र, किसी धर्म अथवा किसी युग की सीमाओं में बँधा नहीं होता। सत्य की प्रतिष्ठा तर्क, परीक्षण और प्रमाण से होती है। यदि किसी तथ्य के समर्थन में स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध हैं, यदि किसी आविष्कार के पीछे उसके विकास का क्रम दिखाई देता है, यदि उसके अस्तित्व का उल्लेख उसके वास्तविक आविष्कार से पूर्व विश्वसनीय रूप में मिलता है और यदि स्वतंत्र स्रोत भी उसकी पुष्टि करते हैं, तभी उसे स्थापित सत्य कहा जा सकता है। यही दृष्टिकोण विज्ञान को विश्वसनीय बनाता है, इतिहास को प्रामाणिक बनाता है और मानव बुद्धि को निरन्तर प्रगति की ओर अग्रसर करता है।

मानव सभ्यता की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल ज्ञान का संचय नहीं है, बल्कि सत्य और असत्य के बीच भेद करने की क्षमता का विकास है। यदि मनुष्य ने प्रत्येक कथन को बिना जाँच-परख के स्वीकार कर लिया होता, तो न विज्ञान जन्म लेता, न इतिहास का निर्माण होता, न न्याय की स्थापना सम्भव होती और न ही ज्ञान की कोई विश्वसनीय परम्परा विकसित हो पाती। मनुष्य को अन्य प्राणियों से अलग करने वाली सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह प्रश्न करता है, तर्क करता है, प्रमाण खोजता है और तब किसी निष्कर्ष तक पहुँचता है। यही प्रक्रिया सभ्यता को अन्धविश्वास से निकालकर विवेक के प्रकाश तक ले जाती है।

भारतीय दर्शन का अद्वितीय योगदान यह है कि उसने सत्य को केवल विश्वास का विषय न मानकर प्रमाणों की कसौटी पर परखा। भारतीय दर्शन में छह प्रमुख प्रमाण—प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, अर्थापत्ति और अनुपलब्धि—स्वीकार किए गए हैं। प्रत्यक्ष इन्द्रियजन्य अनुभव देता है, अनुमान तर्क द्वारा अदृश्य सत्य तक पहुँचाता है, उपमान समानता से ज्ञान कराता है, शब्द विश्वसनीय स्रोतों से सत्य प्रदान करता है, अर्थापत्ति परिस्थितियों के आधार पर आवश्यक निष्कर्ष तक पहुँचाती है और अनुपलब्धि किसी वस्तु के अभाव का ज्ञान कराती है।

यदि इन प्रमाणों को सामान्यतः विश्वसनीयता और प्रत्यक्षता के आधार पर क्रमबद्ध किया जाए, तो प्रथम स्थान प्रत्यक्ष का है, क्योंकि वह सीधे अनुभव पर आधारित होता है। उसके बाद अनुमान, जो प्रत्यक्ष तथ्यों पर आधारित तार्किक निष्कर्ष देता है। तृतीय स्थान अर्थापत्ति का है, क्योंकि वह उपलब्ध तथ्यों में सामंजस्य स्थापित करते हुए आवश्यक निष्कर्ष तक पहुँचाती है। इसके बाद अनुपलब्धि आती है, जो उचित खोज के बाद किसी वस्तु के अभाव का ज्ञान कराती है। पाँचवाँ स्थान उपमान का है, जो समानता के आधार पर ज्ञान देता है। अंत में शब्द प्रमाण आता है, क्योंकि उसकी विश्वसनीयता वक्ता, ग्रन्थ या स्रोत की प्रामाणिकता पर निर्भर करती है और इसलिए उसे अन्य प्रमाणों से परखा जाना आवश्यक होता है।

किसी भी तथ्य को केवल इसलिए सत्य नहीं माना जा सकता कि वह अत्यन्त प्राचीन है, लोकप्रिय है, किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति ने कहा है अथवा वह हमारी भावनाओं को प्रिय लगता है। सत्य का अपना एक स्वभाव होता है। उसे किसी विशेष व्यक्ति, समुदाय या राष्ट्र की स्वीकृति की आवश्यकता नहीं होती। यदि वह वास्तव में सत्य है, तो उसके समर्थन में ऐसे प्रमाण अवश्य मिलेंगे जिन्हें स्वतंत्र रूप से परखा जा सके। प्रमाण का अर्थ केवल किसी ग्रन्थ में लिखी हुई पंक्ति नहीं है। प्रमाण वह है जो परीक्षण की कसौटी पर खरा उतरे, जिसे विभिन्न स्रोतों से सत्यापित किया जा सके और जो तर्क तथा अनुभव—दोनों के साथ संगति रखता हो।

मानव इतिहास का प्रत्येक महत्त्वपूर्ण आविष्कार हमें यह सिखाता है कि विकास कभी आकस्मिक नहीं होता। कोई भी जटिल तकनीक शून्य से प्रकट नहीं हो जाती। वह अनगिनत छोटे-छोटे प्रयोगों, असंख्य सफलताओं और असफलताओं तथा पीढ़ियों के अनुभवों से होकर परिपक्व होती है। आज यदि हम अन्तरिक्ष यान को पृथ्वी से उड़ते हुए देखते हैं, तो उसके पीछे हजारों वर्षों की तकनीकी यात्रा छिपी हुई है। पहिए का आविष्कार, धातुओं का ज्ञान, यांत्रिक संरचनाओं का विकास, भाप की शक्ति, आन्तरिक दहन इंजन, मोटरगाड़ी, विमान, रॉकेट, उपग्रह और आधुनिक कम्प्यूटर—इन सबने मिलकर स्पेस शटल जैसी जटिल तकनीक को सम्भव बनाया है। यदि इस सम्पूर्ण विकासक्रम के किसी भी चरण का अस्तित्व न होता, तो अन्तिम उपलब्धि भी सम्भव नहीं होती।

इसी कारण यदि कोई यह दावा करे कि किसी प्राचीन काल में आधुनिक स्पेस शटल जैसी तकनीक विद्यमान थी, तो केवल इतना कहना पर्याप्त नहीं होगा कि किसी ग्रन्थ में आकाश में उड़ने वाली किसी वस्तु का उल्लेख है। उस दावे के साथ यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि उस समय धातु विज्ञान किस स्तर पर था, ईंधन का स्वरूप क्या था, प्रक्षेपण की तकनीक कैसी थी, तापरोधी पदार्थ कैसे बनाए जाते थे, दिशा-निर्देशन की व्यवस्था क्या थी और उन सबके भौतिक अवशेष कहाँ उपलब्ध हैं। यदि इन मूलभूत प्रश्नों के उत्तर प्रमाण सहित उपलब्ध नहीं हैं, तो ऐसे दावे को इतिहास अथवा विज्ञान का स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।

ज्ञान का स्वभाव निरन्तरता है। प्रत्येक नई खोज अपने पहले की खोजों पर खड़ी होती है। यदि किसी समाज ने अत्यन्त विकसित तकनीक प्राप्त कर ली होती, तो उसके निर्माण की कार्यशालाएँ, औजार, अधूरे नमूने, प्रशिक्षण की व्यवस्था, तकनीकी शब्दावली, मरम्मत की विधियाँ और उससे सम्बन्धित अनेक सहायक प्रमाण भी कहीं न कहीं अवश्य मिलते। किसी विशाल वृक्ष का अस्तित्व उसकी जड़ों के बिना नहीं हो सकता। उसी प्रकार किसी महान तकनीक का अस्तित्व उसके विकासक्रम के बिना सम्भव नहीं है। यदि जड़ें दिखाई ही न दें, उनका कोई प्रमाण न मिले और केवल वृक्ष का दावा किया जाए, तो स्वाभाविक रूप से संशय उत्पन्न होगा।
-शेखर

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