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युद्ध के उन्मूलम में सबसे बड़ी बाधा है निजीकरण

युद्ध के उन्मूलम में सबसे बड़ी बाधा है निजीकरण

युद्ध आजकल केवल राजनीतिक या सामरिक घटना नहीं रह गया है, बल्कि वह एक विशाल आर्थिक संरचना का भी हिस्सा बन चुका है। आज रक्षा उद्योग विश्व के सबसे बड़े और सर्वाधिक लाभदायक उद्योगों में गिना जाता है। लड़ाकू विमान, मिसाइलें, टैंक, युद्धपोत, ड्रोन, साइबर युद्ध प्रणालियाँ, उपग्रह तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सैन्य उपकरणों का व्यापार खरबों डॉलर की अर्थव्यवस्था का निर्माण करता है। इस उद्योग में निजी कम्पनियों की भूमिका निरंतर बढ़ती जा रही है। इसके साथ ही यह प्रश्न भी अधिक महत्वपूर्ण होता जा रहा है कि क्या ऐसे संवेदनशील क्षेत्र को निजी लाभ की प्रेरणा पर आधारित संस्थाओं के हाथों में छोड़ना उचित है?

इस विषय पर विचार करते समय सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि किसी भी निजी कम्पनी का मूल उद्देश्य लाभ कमाना होता है। वह समाज सेवा, शांति स्थापना या मानव कल्याण के लिए नहीं, बल्कि अपने निवेशकों और शेयरधारकों के लिए अधिकतम आर्थिक लाभ अर्जित करने के लिए अस्तित्व में आती है। यह कोई नैतिक दोष नहीं बल्कि निजी उद्यम की मूल प्रकृति है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब लाभ कमाने की यह प्रेरणा उन उत्पादों से जुड़ जाती है जिनका सीधा संबंध युद्ध, हिंसा और विनाश से होता है। रक्षा उत्पाद बनाने वाली निजी कम्पनियाँ अपनी बिक्री बढ़ाने के लिए अनेक प्रकार की गतिविधियाँ करती हैं। सबसे पहले वे लगातार नए और अधिक उन्नत हथियार विकसित करती हैं। प्रत्येक नई तकनीक को पहले की तुलना में अधिक प्रभावशाली, अधिक सुरक्षित और अधिक आवश्यक बताया जाता है। इससे देशों पर अपने पुराने हथियारों को बदलने और नए हथियार खरीदने का दबाव बढ़ता है। परिणामस्वरूप हथियारों की मांग लगातार बनी रहती है।

दूसरा महत्वपूर्ण माध्यम रक्षा प्रदर्शनियाँ, अंतरराष्ट्रीय सैन्य मेले और तकनीकी सम्मेलनों का आयोजन है। इन आयोजनों में विभिन्न देशों के सैन्य अधिकारियों और नीति-निर्माताओं को आमंत्रित किया जाता है। उन्हें नए हथियारों की क्षमताओं का प्रदर्शन किया जाता है और यह विश्वास दिलाया जाता है कि आधुनिक सुरक्षा चुनौतियों का सामना करने के लिए इन प्रणालियों का अधिग्रहण आवश्यक है। यह प्रक्रिया सामान्य व्यापारिक दृष्टि से उचित प्रतीत हो सकती है, किन्तु इसके माध्यम से हथियारों के लिए निरंतर बाजार तैयार किया जाता है।

तीसरा माध्यम राजनीतिक प्रभाव है। रक्षा उद्योग का आर्थिक आकार इतना बड़ा होता है कि वह अनेक देशों में नीति-निर्माण को प्रभावित करने की क्षमता प्राप्त कर लेता है। राजनीतिक चंदे, लॉबिंग, विशेषज्ञ रिपोर्टों का वित्तपोषण और मीडिया विमर्श पर प्रभाव जैसे माध्यमों से रक्षा उद्योग यह वातावरण बना सकता है कि सैन्य व्यय में वृद्धि राष्ट्रीय आवश्यकता है। इससे यह आशंका उत्पन्न होती है कि कहीं सुरक्षा नीतियाँ वास्तविक आवश्यकताओं के बजाय आर्थिक हितों से प्रभावित तो नहीं हो रही हैं।

चौथा माध्यम भय और असुरक्षा की भावना को बढ़ाना है। जब किसी क्षेत्र में तनाव उत्पन्न होता है, तब रक्षा उद्योग के लिए यह एक संभावित बाजार का संकेत बन सकता है। यदि किसी देश को यह महसूस कराया जाए कि उसका पड़ोसी तेजी से सैन्य शक्ति बढ़ा रहा है, तो वह स्वयं भी हथियार खरीदने लगेगा। इसके परिणामस्वरूप हथियारों की दौड़ शुरू हो जाती है। प्रत्येक देश अपनी सुरक्षा बढ़ाने का प्रयास करता है, किन्तु दूसरे देश इसे खतरे के रूप में देखते हैं। इस प्रकार सुरक्षा की खोज ही असुरक्षा का कारण बन जाती है।

पाँचवाँ माध्यम दीर्घकालिक निर्भरता पैदा करना है। आधुनिक सैन्य प्रणालियाँ केवल खरीदने तक सीमित नहीं होतीं। उनके रखरखाव, प्रशिक्षण, तकनीकी उन्नयन और स्पेयर पार्ट्स की निरंतर आवश्यकता होती है। इस प्रकार एक बार हथियार खरीदने के बाद कोई देश कई वर्षों तक उसी कम्पनी पर निर्भर बना रह सकता है। इससे कम्पनी को स्थायी आय प्राप्त होती रहती है।

इन परिस्थितियों में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या ऐसी प्रवृत्तियों पर प्रभावी नियंत्रण संभव है। सैद्धांतिक रूप से इसका उत्तर हाँ है। पारदर्शिता, स्वतंत्र निगरानी, कठोर नियम, राजनीतिक वित्तपोषण पर नियंत्रण और अंतरराष्ट्रीय समझौतों के माध्यम से रक्षा उद्योग को नियंत्रित किया जा सकता है। किन्तु व्यवहारिक स्तर पर स्थिति इतनी सरल नहीं है। जिस उद्योग के पास विशाल आर्थिक संसाधन हों, जो लाखों लोगों को रोजगार देता हो और जो राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र से जुड़ा हो, उसे पूरी तरह नियंत्रित करना अत्यंत कठिन कार्य है।

यही कारण है कि अनेक चिंतक यह तर्क प्रस्तुत करते हैं कि समस्या का वास्तविक समाधान नियंत्रण नहीं बल्कि संरचनात्मक परिवर्तन है। उनके अनुसार रक्षा उत्पादन से निजी कम्पनियों को पूर्णतः अलग कर देना चाहिए और इस क्षेत्र को पूरी तरह सार्वजनिक नियंत्रण में रखा जाना चाहिए।

इस तर्क का पहला आधार उत्तरदायित्व है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में राज्य जनता के प्रति उत्तरदायी होता है। सरकारें चुनावों के माध्यम से बदल सकती हैं। संसद उनसे प्रश्न पूछ सकती है। न्यायालय उनके निर्णयों की समीक्षा कर सकते हैं। मीडिया उनकी आलोचना कर सकता है और नागरिक उन्हें उत्तरदायी ठहरा सकते हैं। इसके विपरीत निजी कम्पनियों का प्राथमिक उत्तरदायित्व जनता के प्रति नहीं बल्कि अपने निवेशकों के प्रति होता है। यदि किसी कम्पनी की गतिविधियों के कारण हथियारों की दौड़ बढ़ती है या सैन्य तनाव में वृद्धि होती है, तो उसे लोकतांत्रिक रूप से उत्तरदायी ठहराना अत्यंत कठिन होता है।

दूसरा आधार नैतिकता का है। राज्य का घोषित उद्देश्य नागरिकों की सुरक्षा और सार्वजनिक हित की रक्षा करना होता है। जबकि निजी कम्पनी का उद्देश्य लाभ कमाना होता है। जब रक्षा उत्पादन निजी हाथों में होता है, तब सुरक्षा और लाभ के बीच अंतर्विरोध उत्पन्न हो सकता है। यदि शांति स्थापित हो जाए तो हथियारों की मांग घट सकती है, किन्तु यदि तनाव बना रहे तो मांग बढ़ सकती है। इस स्थिति में आर्थिक हित और सार्वजनिक हित हमेशा एक दिशा में नहीं चलते।

तीसरा आधार लोकतांत्रिक नियंत्रण का है। सार्वजनिक क्षेत्र में कार्यरत संस्थाओं पर संसद, लेखा-परीक्षा एजेंसियों और न्यायिक संस्थाओं की निगरानी अपेक्षाकृत अधिक प्रभावी होती है। निजी कम्पनियाँ व्यावसायिक गोपनीयता के नाम पर अनेक जानकारियों को सार्वजनिक करने से बच सकती हैं। इससे पारदर्शिता कम हो जाती है।

चौथा आधार विश्व शांति का है। यदि हथियारों के उत्पादन से निजी लाभ की संभावना समाप्त हो जाए, तो सैन्यीकरण को बढ़ावा देने वाली एक महत्वपूर्ण आर्थिक शक्ति कमजोर पड़ सकती है। तब रक्षा उत्पादन का उद्देश्य बाजार विस्तार नहीं बल्कि वास्तविक सुरक्षा आवश्यकताओं की पूर्ति रह जाएगा। इससे हथियारों की अनावश्यक प्रतिस्पर्धा कम हो सकती है।

पाँचवाँ आधार संसाधनों के उपयोग से जुड़ा है। निजी रक्षा उद्योग का लक्ष्य अधिक बिक्री होता है, जबकि सार्वजनिक क्षेत्र का लक्ष्य आवश्यकतानुसार उत्पादन हो सकता है। यदि रक्षा उत्पादन पूर्णतः सार्वजनिक नियंत्रण में हो, तो सैन्य आवश्यकताओं और सामाजिक विकास के बीच बेहतर संतुलन स्थापित किया जा सकता है।

हालाँकि इस दृष्टिकोण की आलोचनाएँ भी हैं। कुछ लोग तर्क देते हैं कि सार्वजनिक क्षेत्र में अक्षमता, भ्रष्टाचार और तकनीकी पिछड़ापन हो सकता है। उनका कहना है कि निजी क्षेत्र प्रतिस्पर्धा और नवाचार को बढ़ावा देता है। यह आलोचना पूर्णतः निराधार नहीं है। किन्तु इसके उत्तर में यह कहा जा सकता है कि रक्षा उत्पादन का प्रश्न केवल दक्षता का नहीं बल्कि उत्तरदायित्व का भी है। यदि सार्वजनिक संस्थाओं में कमियाँ हैं, तो उनका समाधान सुधार है, न कि ऐसे क्षेत्र का निजीकरण जिसमें मानव जीवन और वैश्विक शांति दाँव पर लगी हो।

वास्तव में इतिहास यह दर्शाता है कि अनेक देशों ने रक्षा उत्पादन के महत्वपूर्ण क्षेत्रों को लंबे समय तक सार्वजनिक नियंत्रण में रखकर भी उल्लेखनीय उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं। वैज्ञानिक अनुसंधान, तकनीकी विकास और सैन्य आत्मनिर्भरता केवल निजी क्षेत्र की देन नहीं हैं। सार्वजनिक संस्थाएँ भी यदि पर्याप्त संसाधन, स्वायत्तता और उत्तरदायित्व प्राप्त करें तो उत्कृष्ट कार्य कर सकती हैं।

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या युद्ध और शांति जैसे विषयों को लाभ के तर्क पर छोड़ा जा सकता है। खाद्य पदार्थों, कपड़ों या उपभोक्ता वस्तुओं के बाजार में लाभ एक स्वाभाविक प्रेरणा हो सकती है, किन्तु हथियारों के क्षेत्र में यही प्रेरणा गंभीर नैतिक प्रश्न उत्पन्न करती है। जब किसी उद्योग की समृद्धि हथियारों की अधिक बिक्री पर निर्भर हो, तब यह आशंका बनी रहती है कि वह प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सैन्यीकरण को बढ़ावा देगा।

मानवता का दीर्घकालिक हित इस बात में है कि सुरक्षा को व्यापार नहीं बनने दिया जाए। राष्ट्रीय सुरक्षा एक सार्वजनिक उत्तरदायित्व है, कोई बाजार उत्पाद नहीं। यदि सुरक्षा की व्यवस्था लाभ कमाने की प्रेरणा से संचालित होगी, तो सार्वजनिक हित और निजी हित के बीच संघर्ष की संभावना सदैव बनी रहेगी।

इसलिए यह तर्क बलपूर्वक प्रस्तुत किया जा सकता है कि रक्षा उत्पादन, हथियार निर्माण, सैन्य अनुसंधान और हथियार व्यापार जैसे क्षेत्रों को यथासंभव सार्वजनिक नियंत्रण में रखा जाना चाहिए। इससे कम-से-कम यह सुनिश्चित होगा कि निर्णयों का आधार निजी लाभ नहीं बल्कि सार्वजनिक उत्तरदायित्व होगा। राज्य की आलोचना की जा सकती है, उसे बदला जा सकता है और उससे जवाब माँगा जा सकता है; किन्तु वैश्विक स्तर पर निजी कम्पनियों को उसी प्रकार उत्तरदायी ठहराना अत्यंत कठिन है।

अंततः कहा जा सकता है कि निजी रक्षा कम्पनियाँ अपनी बिक्री बढ़ाने के लिए तकनीकी नवाचार, प्रचार, राजनीतिक प्रभाव, सुरक्षा संबंधी चिंताओं को प्रमुखता देने और दीर्घकालिक निर्भरता उत्पन्न करने जैसे अनेक उपाय अपनाती हैं। यद्यपि इन गतिविधियों में से कई कानूनी हो सकती हैं, फिर भी वे हथियारों की मांग और सैन्यीकरण को बढ़ाने वाली संरचनात्मक प्रवृत्तियों को जन्म दे सकती हैं। इस समस्या के समाधान के लिए विभिन्न नियामक उपाय अपनाए जा सकते हैं, किन्तु एक दृष्टिकोण यह भी है कि सबसे प्रभावी और स्थायी समाधान रक्षा उत्पादन को पूर्णतः सार्वजनिक क्षेत्र तक सीमित करना है। क्योंकि राज्य लोकतांत्रिक संस्थाओं के माध्यम से जनता के प्रति उत्तरदायी होता है, जबकि निजी कम्पनियों का मूल उत्तरदायित्व लाभ कमाने तक सीमित रहता है। यदि मानवता को युद्ध की अर्थव्यवस्था से शांति की संस्कृति की ओर बढ़ना है, तो इस प्रश्न पर गंभीर और व्यापक वैश्विक विमर्श की आवश्यकता है।
– शेखर

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