ग़ज़ल
वीरेन्द्र कुमार शेखर
वक़्त मुझसे दोस्ती ही दोस्ती करता रहा,
और उसके साथ मैं बस दिल्लगी करता रहा |
मानकर उसको मसीहा, पूजते मक़्तूल थे,
जिब्ह करते बात कुछ जो पंथ की करता रहा।
सोचने-करने के वक़्तों में रहा गफ़लत में जो,
वो तो ख़ुद के साथ खुल के दुश्मनी करता रहा।
कोई तो होगा मेरे जैसा, कुछ ऐसा सोच के,
जो मिला, मैं उससे बढ़ के, दोस्ती करता रहा।
ज़िम्मेदारी जिसको भी दी, बंद रख के आँख- कान,
कार्यवाई देख लो वो काग़जी करता रहा।
कर दिखाया जिसने कुछ, सब मुश्किलों के बावज़ूद,
वो अँधेरे रास्तों में रोशनी करता रहा।
मसीहा= मृतक को जिलाने वाला, मक़्तूल=जिसका क़त्ल हुआ हो, जिब्ह करना= गला रेत कर मारना, गफ़लत=असावधानी, बेपरवाही, बेसुधी
