ग़ज़ल
वीरेन्द्र कुमार शेखर
क्या मैं इतनी भी न हसरत करता?
वो ज़रा प्यार से रुख़सत करता।
यार इतनी तो शरारत करता,
तर्क करने को मुहब्बत करता।
उससे बस एक शिकायत है मेरी,
कुछ कभी वो भी शिकायत करता।
आना-जाना जो है दस्तूर यहाँ,
दर्द मेरा भी तो हिजरत करता।
हक़ से महरूम जिसे करते हो,
हक़ उसे है कि बग़ावत करता।
हक़ में होता अगर ये इंसां के,
मैं खुले आम बग़ावत करता।
बात ये किस सदी की है ‘शेखर’,
आजकल कौन रफ़ाक़त करता।
हसरत=इच्छा, तर्क करना= छोड़ देना, हिजरत करना=प्रस्थान करना, विदा होना, रफ़ाक़त=दोस्ती, ,
