मनक़बत
डॉ. वीरेन्द्र कुमार ‘शेखर’
हक़ी़क़तों को बताती,है करबला अब तक
उन्हीं का सोग मनाती, है करबला अब तक
शहादतों को जो ईमान मानते आए
उन्हीं को राह दिखाती, है करबला अब तक
वो जिनमें चाह रही है, के इल्म हासिल हो
उन्हीं को राह बताती,है करबला अब तक
हुआ था सख़्त बहुत आदमी की ख़ातिर जो
वो वक़्त याद दिलाती, है करबला अब तक
वो जिसमें दिल है, जिगर है, ख़ुदा का बंदा है
उसी को दोस्त रुलाती,है करबला अब तक
कुछ इक तो अबभी समझ पाए हक़ न इसपर तो
*लहू के अश्क बहाती है करबला अब तक*
सुनो जो ग़ौर से शेखर तो सुन सकोगे उन्हें
शहादतों को सुनाती, है करबला अब तक।श
